
जामनगर के आयुर्वेद शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान में तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें 52 शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने आंत के सूक्ष्मजीवों और आयुर्वेद के संबंधों पर चर्चा की।
मुख्य बातें
- ITRA जामनगर में 9 से 11 सितंबर 2026 तक 3-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन हुआ।
- कार्यशाला में 52 फैकल्टी सदस्यों और शोध छात्रों ने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया।
- प्रो. शर्मिला मांडे और डॉ. तारिणी शंकर घोष ने आधुनिक वैज्ञानिक साक्ष्यों पर व्याख्यान दिए।
- आयुर्वेदिक अवधारणाओं जैसे अग्नि, आहार और प्रकृति को आधुनिक सूक्ष्मजीव विज्ञान से जोड़ने पर सहमति बनी।
- ITRA निदेशक प्रो. तनुजा नेसारी की अध्यक्षता में बहु-केंद्रित अनुसंधान की रूपरेखा तैयार की गई।
माइक्रोबायोम अनुसंधान और प्राचीन आयुर्वेद के सिद्धांतों को मिलाकर बेहतर स्वास्थ्य तकनीक विकसित करने के प्रयास तेज हो गए हैं। आयुष मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय महत्व के संस्थान, आयुर्वेद में शिक्षण और अनुसंधान संस्थान (ITRA), जामनगर ने 9 से 11 सितंबर 2026 तक तीन दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इस कार्यक्रम का मुख्य विषय ‘माइक्रोबायोम अनुसंधान के माध्यम से स्वास्थ्य और कल्याण को समझना’ रखा गया था। जामनगर परिसर में आयोजित इस कार्यशाला में देश के वैज्ञानिकों, शिक्षकों और शोधार्थियों ने हिस्सा लिया।
माइक्रोबायोम अनुसंधान क्या है और यह क्यों आवश्यक है?
माइक्रोबायोम अनुसंधान मानव शरीर, विशेषकर पाचन तंत्र में रहने वाले अरबों सूक्ष्मजीवों जैसे बैक्टीरिया, कवक और वायरस का वैज्ञानिक अध्ययन है। यह अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि आंतों में मौजूद ये सूक्ष्मजीव हमारे पाचन, चयापचय क्षमता और प्रतिरक्षा तंत्र को किस प्रकार नियंत्रित करते हैं। इस तकनीक की मदद से व्यक्ति की शारीरिक संरचना के अनुसार सटीक आहार और निवारक स्वास्थ्य देखभाल की योजना बनाई जाती है।
कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक माइक्रोबायोम विज्ञान और आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांतों में गहरी समानताएं हैं। आयुष मंत्रालय की आयुष विशिष्ट वैज्ञानिक चेयर प्रो. शर्मिला मांडे और इंद्रप्रस्थ सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT) दिल्ली की सहायक प्रोफेसर डॉ. तारिणी शंकर घोष ने तकनीकी सत्रों को संबोधित किया। दोनों वैज्ञानिकों ने माइक्रोबायोम विज्ञान में हो रहे नए शोधों, डाटा विश्लेषण विधियों और आधुनिक तकनीकों की जानकारी प्रतिभागियों के साथ साझा की।
माइक्रोबायोम अनुसंधान और आयुर्वेद के ‘अग्नि’ सिद्धांत का संबंध
आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में शरीर के संपूर्ण स्वास्थ्य का आधार ‘अग्नि’ यानी पाचन और चयापचय शक्ति को माना गया है। जामनगर में आयोजित इस मंथन में यह बात रेखांकित की गई कि आधुनिक विज्ञान जिसे आंतों का माइक्रोबायोम (Gut Microbiome) कहता है, वह काफी हद तक आयुर्वेद के अग्नि, आहार और प्रकृति के सिद्धांतों से मेल खाता है।
कार्यशाला के विभिन्न सत्रों में व्यक्तिगत पोषण, पाचन स्वास्थ्य, चयापचय की गड़बड़ियों और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों पर विस्तार से चर्चा हुई। वैज्ञानिकों ने बताया कि हर व्यक्ति के शरीर का माइक्रोबायोम पैटर्न अलग होता है, ठीक उसी तरह जैसे आयुर्वेद में हर व्यक्ति की प्रकृति (वात, पित्त, कफ) भिन्न मानी जाती है। यदि इन दोनों विधाओं को मिलाकर अध्ययन किया जाए, तो साक्ष्य-आधारित चिकित्सा विकसित करने में आसानी होगी।
इसका असर: आम मरीजों और आम जनता को क्या लाभ होगा?
इस तरह के अंतर-विषयक (Interdisciplinary) शोध से आम मरीजों को सीधा फायदा मिलेगा। वर्तमान समय में खान-पान के बिगड़ने से पेट से जुड़ी बीमारियां, मोटापा, मधुमेह और कमजोर इम्युनिटी जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। माइक्रोबायोम और आयुर्वेदिक आहार नियमों के मेल से मरीजों के लिए व्यक्तिगत डाइट चार्ट और प्राकृतिक इलाज की व्यवस्था करना संभव हो सकेगा।
शोधकर्ताओं के अनुसार, जब आयुर्वेदिक औषधियों और जड़ी-बूटियों का प्रभाव आंत के बैक्टीरिया पर मापा जाएगा, तो वैश्विक स्तर पर आयुर्वेद की वैज्ञानिक स्वीकार्यता और मजबूत होगी। इससे मरीज को अनावश्यक एंटीबायोटिक दवाओं के दुष्प्रभाव से बचाया जा सकेगा और प्राकृतिक तरीके से आंत के स्वास्थ्य को सुधारा जा सकेगा।
ITRA जामनगर में तैयार हुई भविष्य के शोध की रूपरेखा
तीन दिवसीय कार्यशाला का समापन ITRA की निदेशक प्रो. तनुजा नेसारी की अध्यक्षता में आयोजित एक उच्चस्तरीय विचार-मंथन सत्र के साथ हुआ। इस सत्र का उद्देश्य देश के अलग-अलग संस्थानों के साथ मिलकर बहु-केंद्रित (Multi-centre) शोध परियोजनाओं को शुरू करना था।
निदेशक प्रो. तनुजा नेसारी ने कहा कि संस्थान का लक्ष्य आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को आधुनिक वैज्ञानिक फ्रेमवर्क पर कसकर वैश्विक पहचान दिलाना है। इस कार्यशाला में कुल 52 संकाय (फैकल्टी) सदस्यों और शोध छात्रों ने हिस्सा लिया, जिन्हें आंत के सूक्ष्मजीवों की प्रयोगशाला जांच और डेटा संग्रह के व्यावहारिक तरीकों से अवगत कराया गया।
कार्यशाला से जुड़ी प्रमुख बातें
- आयोजन अवधि: 9 सितंबर से 11 सितंबर 2026 तक तीन दिवसीय कार्यक्रम।
- आयोजक: आयुर्वेद में शिक्षण और अनुसंधान संस्थान (ITRA), जामनगर, गुजरात।
- संबद्ध मंत्रालय: आयुष मंत्रालय, भारत सरकार।
- प्रतिभागी संख्या: 52 शोध छात्र और फैकल्टी सदस्य।
- प्रमुख क्षेत्र: आंतों के सूक्ष्मजीव, अग्नि, आहार, प्रकृति और साक्ष्य-आधारित आयुर्वेद।
आयुर्वेद में साक्ष्य-आधारित शोध का नया अध्याय
गुजरात के जामनगर में स्थित ITRA देश का पहला आयुर्वेद संस्थान है जिसे संसद के अधिनियम द्वारा राष्ट्रीय महत्व के संस्थान (INI) का दर्जा दिया गया है। संस्थान लगातार ऐसे वैज्ञानिक आयोजनों के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान को साक्ष्य-आधारित आधुनिक चिकित्सा पद्धति में बदलने में लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में माइक्रोबायोम अनुसंधान के जरिए आयुर्वेदिक थेरेपी और पंचकर्म जैसी प्रक्रियाओं के वैज्ञानिक प्रभावों को भी प्रमाणित किया जा सकेगा। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति बनाने और निवारक स्वास्थ्य देखभाल (Preventive Healthcare) को गांव-गांव तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: जामनगर ITRA में किस विषय पर कार्यशाला आयोजित की गई?
उत्तर: ITRA जामनगर में 9 से 11 सितंबर 2026 के दौरान ‘माइक्रोबायोम अनुसंधान के माध्यम से स्वास्थ्य और कल्याण को समझना’ विषय पर तीन दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई।
प्रश्न: माइक्रोबायोम और आयुर्वेद का आपस में क्या संबंध है?
उत्तर: आधुनिक विज्ञान का आंत माइक्रोबायोम सिद्धांत आयुर्वेद की ‘अग्नि’ (पाचन शक्ति), ‘आहार’ और ‘प्रकृति’ की अवधारणा से सीधा संबंध रखता है, जो पाचन और रोग प्रतिरोधक क्षमता को नियंत्रित करता है।
प्रश्न: इस कार्यशाला में किन मुख्य विशेषज्ञों ने भाग लिया?
उत्तर: इसमें आयुष विशिष्ट वैज्ञानिक चेयर प्रो. शर्मिला मांडे, IIIT-दिल्ली की डॉ. तारिणी शंकर घोष और ITRA निदेशक प्रो. तनुजा नेसारी सहित 52 शोधकर्ताओं ने भाग लिया।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






