
भारत में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं कैसे तय की जाती हैं? परिसीमन की प्रक्रिया, नियम और इसके राजनीतिक प्रभाव की पूरी जानकारी।
मुख्य बातें
- परिसीमन का अर्थ है आबादी के आधार पर चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन करना।
- यह कार्य एक स्वतंत्र निकाय ‘परिसीमन आयोग’ द्वारा किया जाता है।
- परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की आरक्षित सीटें भी परिसीमन से ही तय होती हैं।
परिसीमन क्या है, यह सवाल देश की संपूर्ण चुनावी राजनीति और लोकतांत्रिक ढाँचे से जुड़ा हुआ है। आसान शब्दों में कहें तो परिसीमन का अर्थ किसी देश या राज्य में जनसंख्या के नए आंकड़ों के अनुसार विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण करना है।
परिसीमन क्या है?
परिसीमन क्या है? यह एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसके तहत हालिया जनगणना के आधार पर देश में लोक सभा और राज्य विधान सभा सीटों की सीमाओं तथा उनकी संख्या का पुनर्गठन किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य हर निर्वाचन क्षेत्र में आबादी का अनुपात लगभग बराबर रखना है ताकि प्रत्येक नागरिक के वोट का मूल्य समान रहे।
परिसीमन क्या है और इसके मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
जब किसी क्षेत्र की आबादी समय के साथ घटती या बढ़ती है, तो पुराने चुनावी नक्शे अप्रासंगिक हो जाते हैं। परिसीमन क्या है, इसे समझने के लिए इसके प्रमुख संवैधानिक उद्देश्यों को जानना जरूरी है:
- समान प्रतिनिधित्व: जनसंख्या परिवर्तन के हिसाब से हर चुनावी क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या का संतुलन बनाए रखना।
- संवैधानिक न्याय: संविधान के ‘एक नागरिक, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को जमीनी स्तर पर लागू करना।
- आरक्षित सीटों का निर्धारण: अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी के अनुपात में उनके लिए सुरक्षित सीटों की पहचान करना।
- क्षेत्रीय संतुलन: नए विकसित शहरी क्षेत्रों और ग्रामीण इलाकों को निष्पक्ष प्रतिनिधित्व प्रदान करना।
भारत में परिसीमन कौन करता है?
भारत में परिसीमन का काम एक उच्चस्तरीय और स्वतंत्र निकाय करता है, जिसे ‘परिसीमन आयोग’ (Delimitation Commission) कहा जाता है। राष्ट्रपति द्वारा इस आयोग का गठन किया जाता है और यह भारत निर्वाचन आयोग के साथ मिलकर काम करता है।
परिसीमन आयोग में मुख्य रूप से तीन सदस्य शामिल होते हैं:
- सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश, जो आयोग के अध्यक्ष होते हैं।
- भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त या उनके द्वारा नामित कोई निर्वाचन आयुक्त।
- संबंधित राज्य के राज्य निर्वाचन आयुक्त।
परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के समान दर्जा प्राप्त होता है। संविधान के अनुसार इन आदेशों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। जब आयोग अपने आदेश लोकसभा या राज्य विधानसभाओं के सामने रखता है, तो उनमें किसी भी तरह के संशोधन करने का अधिकार संसद को भी नहीं होता।
परिसीमन की चरण-दर-चरण प्रक्रिया
परिसीमन आयोग पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इन चरणों का पालन करता है:
- जनगणना आंकड़ों का अध्ययन करना: आयोग सबसे पहले हालिया राष्ट्रीय जनगणना के आधिकारिक आंकड़े प्राप्त करता है और जिलावार आबादी का विश्लेषण करता है।
- प्रारूप (Draft) तैयार करना: आबादी के अनुपात के आधार पर सीमाओं का नया नक्शा तैयार किया जाता है और आरक्षित सीटों की सूची बनाई जाती है।
- सार्वजनिक सुझाव प्राप्त करना: आयोग अपने प्रारंभिक प्रस्तावों को भारत के राजपत्र और स्थानीय समाचार पत्रों में प्रकाशित करके आम जनता से राय मांगता है।
- जनसुनवाई आयोजित करना: आयोग विभिन्न राज्यों में जाकर आम नागरिकों, राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की आपत्तियों और सुझावों पर सीधी सुनवाई करता है।
- अंतिम अधिसूचना जारी करना: प्राप्त सुझावों पर विचार करने के बाद आयोग अंतिम आदेश पारित करता है, जो राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद लागू होता है।
सीटें फ्रीज होने की वजह और राजनीतिक विवाद
भारत के संविधान के अनुसार, हर जनगणना के बाद परिसीमन होना चाहिए था। देश में 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोगों का गठन हुआ। 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या को वर्ष 2000 तक के लिए स्थिर (फ्रिज) कर दिया गया था। इसके बाद 84वें संविधान संशोधन (2002) द्वारा इसे वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया।
वर्तमान में परिसीमन को लेकर उत्तर और दक्षिण के राज्यों के बीच राजनीतिक असंतुलन की चिंता जताई जा रही है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों को सफलता से लागू किया है। इसके विपरीत उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि दर अधिक रही है।
यदि केवल आबादी के आधार पर परिसीमन होता है, तो उत्तरी राज्यों की लोकसभा सीटों में भारी बढ़ोतरी होगी, जबकि दक्षिणी राज्यों की सीटों का अनुपात घट जाएगा। इस वजह से यह विषय अत्यधिक संवेदनशील माना जाता है।
भारत में परिसीमन का इतिहास
| वर्ष | आधार जनगणना | मुख्य निर्णय |
|---|---|---|
| 1952 | 1951 | पहला परिसीमन आयोग गठित हुआ। |
| 1963 | 1961 | राज्यों की सीटों का पुनर्गठन किया गया। |
| 1973 | 1971 | लोकसभा की कुल सीटें 543 तय की गईं। |
| 2002 | 2001 | केवल सीमाओं का पुनर्गठन हुआ, सीटों की संख्या नहीं बढ़ी। |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: परिसीमन क्या है और यह कितने साल बाद होता है?
उत्तर: परिसीमन क्या है, इसका सीधा उत्तर है चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन। संवैधानिक नियम के अनुसार यह प्रत्येक 10 साल की जनगणना के बाद होना चाहिए, लेकिन संवैधानिक संशोधनों के कारण सीटों की संख्या लंबे समय से रुकी हुई है।
प्रश्न: क्या परिसीमन आयोग के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाया जा सकता है?
उत्तर: नहीं, संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत परिसीमन आयोग के फैसलों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।
प्रश्न: आरक्षित सीटों का चुनाव कैसे किया जाता है?
उत्तर: जिस निर्वाचन क्षेत्र में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति की आबादी का अनुपात अधिक होता है, आयोग उसे उसी वर्ग के लिए आरक्षित घोषित करता है।
यह जानकारी केवल सामान्य जागरूकता और शैक्षणिक उद्देश्य के लिए है। भारत में चुनाव नियमों, संवैधानिक प्रावधानों और परिसीमन से जुड़ी किसी भी आधिकारिक अपडेट के लिए भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट eci.gov.in पर जांच करें।
आधिकारिक जानकारी और नवीनतम अपडेट के लिए: https://eci.gov.in
यह लेख आज पत्रिका की एक्सप्लेनर डेस्क द्वारा सामान्य जागरूकता के लिए तैयार किया गया है। नियम और प्रक्रियाएं समय-समय पर बदल सकती हैं — कृपया आधिकारिक स्रोत से पुष्टि करें। सुधार/सुझाव: corrections@aajpatrika.com






