शुक्रवार, अक्टूबर 23, 2026

राष्ट्रपति शासन क्या है? जानिए संविधान का अनुच्छेद 356 और इसके नियम

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राष्ट्रपति शासन

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राज्यों में लगने वाले राष्ट्रपति शासन के नियम, प्रक्रिया, अवधि और एस. आर. बोम्मई फैसले की पूरी विस्तृत जानकारी।

मुख्य बातें

  • अनुच्छेद 356 के तहत राज्य की संवैधानिक व्यवस्था विफल होने पर राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है।
  • संसद के दोनों सदनों से 2 महीने के भीतर इसकी स्वीकृति पाना कानूनी रूप से अनिवार्य है।
  • मंजूरी के बाद यह व्यवस्था 6 महीने तक चलती है और अधिकतम 3 साल तक बढ़ाई जा सकती है।
  • एस. आर. बोम्मई फैसले के बाद इसके अनुचित प्रयोग पर अदालत द्वारा न्यायिक समीक्षा संभव है।

भारत में राष्ट्रपति शासन तब लागू किया जाता है जब किसी राज्य की सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार चलने में विफल हो जाती है।

राष्ट्रपति शासन क्या है?

राष्ट्रपति शासन भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में संवैधानिक तंत्र के विफल होने पर लगाया जाने वाला केंद्रीय शासन है। इसके तहत राज्य सरकार को बर्खास्त या विधानसभा को निलंबित कर दिया जाता है। राज्य की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति के पास चली जाती है, जिसका संचालन राज्यपाल करते हैं।

अनुच्छेद 356 और राष्ट्रपति शासन लागू होने के मुख्य कारण

संविधान में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि किन विशेष परिस्थितियों में राज्य की सत्ता केंद्र के हाथ में सौंपी जा सकती है। मुख्य रूप से निम्नलिखित स्थितियों में यह कदम उठाया जाता है:

  • बहुमत का अभाव: विधानसभा चुनाव के बाद किसी भी दल या गठबंधन को स्पष्ट बहुमत न मिलना या मुख्यमंत्री के इस्तीफे के बाद वैकल्पिक सरकार का गठन न हो पाना।
  • अविश्वास प्रस्ताव: राज्य सरकार का सदन में बहुमत खो देना और किसी अन्य दल द्वारा सरकार बनाने की स्थिति में न होना।
  • संवैधानिक निर्देशों की अनदेखी: केंद्र सरकार द्वारा दिए गए संवैधानिक और प्रशासनिक निर्देशों का राज्य सरकार द्वारा पालन न करना (अनुच्छेद 365 के तहत)।
  • कानून-व्यवस्था का पूर्ण संकट: राज्य में ऐसी स्थिति बनना जहाँ कानून और व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो जाए और राज्य सरकार संविधान के अनुसार काम न कर पाए।

राष्ट्रपति शासन लागू होने की पूरी प्रक्रिया

राज्य में व्यवस्था बदलने और केंद्रीय नियंत्रण स्थापित करने के लिए संविधान में एक निश्चित प्रक्रिया तय की गई है। इसके चरण इस प्रकार हैं:

  1. राज्यपाल की रिपोर्ट: राज्य के राज्यपाल राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजकर सूचित करते हैं कि राज्य में संवैधानिक व्यवस्था ध्वस्त हो चुकी है। राष्ट्रपति चाहें तो बिना रिपोर्ट के भी स्वतः निर्णय ले सकते हैं।
  2. केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश: प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल इस संदर्भ में राष्ट्रपति को अपनी औपचारिक सिफारिश भेजता है।
  3. राष्ट्रपति की उद्घोषणा: राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 356 का प्रयोग करते हुए राज्य में आपात शासन की घोषणा करते हैं।
  4. संसद की मंजूरी: उद्घोषणा जारी होने की तिथि से 2 महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से साधारण बहुमत द्वारा स्वीकृति मिलना अनिवार्य है।

राष्ट्रपति शासन लगने पर क्या-क्या बदलता है?

राज्य में यह व्यवस्था लागू होते ही विधायी और प्रशासनिक संचालन में सीधे बदलाव आ जाते हैं:

  • कार्यपालिका शक्ति
  • मुख्यमंत्री और उनकी मंत्रिपरिषद
  • राज्यपाल और उनके नियुक्त सलाहकार
  • राज्य विधानसभा
  • सक्रिय और विधायी कार्य में संलग्न
  • निलंबित या पूरी तरह भंग
  • कानून निर्माण
  • राज्य विधानसभा द्वारा
  • भारत की संसद द्वारा
  • राज्य का बजट
  • राज्य विधानसभा में पारित
  • संसद द्वारा पारित
  • प्रशासनिक क्षेत्रसामान्य स्थितिराष्ट्रपति शासन के दौरान

    मान लीजिए किसी राज्य में सत्तारूढ़ गठबंधन टूट जाता है और कोई भी दल नई सरकार बनाने का दावा प्रस्तुत नहीं करता। ऐसी स्थिति में राज्यपाल विधानसभा को निलंबित रखते हुए राष्ट्रपति शासन की सिफारिश भेजते हैं, जिससे राज्य का संचालन बिना किसी गतिरोध के चलता रहे।

    राष्ट्रपति शासन की अवधि और एस. आर. बोम्मई मामला

    संसद की मंजूरी मिलने के बाद यह व्यवस्था 6 महीने तक प्रभावी रहती है। इसे हर 6 महीने में संसद से पुन: पारित कराकर अधिकतम 3 वर्ष तक लागू रखा जा सकता है। 1 साल से अधिक समय तक इसे जारी रखने के लिए दो शर्तें होना आवश्यक है: देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो तथा भारत निर्वाचन आयोग यह प्रमाणित करे कि राज्य में चुनाव कराना संभव नहीं है।

    वर्ष 1994 के ऐतिहासिक एस. आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र द्वारा इसके दुरुपयोग पर रोक लगाई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति शासन की घोषणा की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। यदि केंद्र का फैसला असंवैधानिक या दुर्भावनापूर्ण पाया जाता है, तो अदालत भंग विधानसभा और बर्खास्त सरकार को दोबारा बहाल कर सकती है।

    नागरिकों के अधिकारों पर इसका असर

    आम जनता के मन में अक्सर यह शंका रहती है कि क्या इस अवधि में नागरिक अधिकार छीन लिए जाते हैं। अनुच्छेद 352 (राष्ट्रीय आपातकाल) के विपरीत, अनुच्छेद 356 के लागू होने पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों (Fundamental Rights) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। राज्य के स्कूल, दफ्तर, अदालतें और सार्वजनिक सेवाएं सामान्य रूप से काम करती रहती हैं। केवल राज्य का शासन तंत्र स्थानीय सरकार के बजाय केंद्र और राज्यपाल के माध्यम से संचालित होता है।

    अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

    प्रश्न? राष्ट्रपति शासन अधिकतम कितने समय तक लागू रह सकता है? संसद के नियमित अनुमोदन से यह अधिकतम 3 वर्षों तक लागू रह सकता है, बशर्ते 1 वर्ष से अधिक की अवधि के लिए चुनाव आयोग की विशेष स्थिति का प्रमाण पत्र आवश्यक हो।

    प्रश्न? क्या इसके लागू होने पर मौलिक अधिकार निलंबित होते हैं? नहीं, अनुच्छेद 356 के तहत राज्यों में शासन बदलने से आम नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित नहीं होते।

    प्रश्न? संसद को इसकी स्वीकृति कितने समय में देनी होती है? राष्ट्रपति की अधिसूचना जारी होने के 2 महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों द्वारा साधारण बहुमत से स्वीकृति पाना अनिवार्य है।

    प्रश्न? भारत में पहली बार यह व्यवस्था कब और कहाँ लागू हुई थी? भारत में पहली बार 1951 में पंजाब राज्य में अनुच्छेद 356 का प्रयोग करके राष्ट्रपति शासन लगाया गया था।

    संवैधानिक नियम और कानूनी प्रक्रियाएं सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों व गृह मंत्रालय के दिशानिर्देशों के अधीन होती हैं। प्रामाणिक जानकारी के लिए भारत का संविधान और गृह मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट mha.gov.in देखें।

    आधिकारिक जानकारी और नवीनतम अपडेट के लिए: https://mha.gov.in

    यह लेख आज पत्रिका की एक्सप्लेनर डेस्क द्वारा सामान्य जागरूकता के लिए तैयार किया गया है। नियम और प्रक्रियाएं समय-समय पर बदल सकती हैं — कृपया आधिकारिक स्रोत से पुष्टि करें। सुधार/सुझाव: corrections@aajpatrika.com

    सौरभ तिवारी
    सौरभ तिवारी
    सौरभ तिवारी आज पत्रिका में राष्ट्रीय एवं राजनीतिक मामलों के संपादक हैं। वे संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही, सरकारी नीतियों, चुनाव, और भारत से जुड़ी बड़ी राष्ट्रीय खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। उनका ज़ोर तथ्य-आधारित, संतुलित और स्रोत-सहित रिपोर्टिंग पर रहता है — हर लेख में वे प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), संबंधित मंत्रालयों की विज्ञप्तियों और आधिकारिक दस्तावेज़ों का हवाला देते हैं। राय और विश्लेषण को वे समाचार से स्पष्ट रूप से अलग रखते हैं। सुझाव या तथ्य-सुधार के लिए: corrections@aajpatrika.com।

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