
18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संस्थागत निरंतरता, नाविक सुरक्षा नेटवर्क और वैश्विक शासन सुधारों का नया खाका पेश किया।
मुख्य बातें
- भारत ने ब्रिक्स की 20वीं वर्षगांठ के अवसर पर संस्थागत निरंतरता के लिए ‘ट्रोइका’ प्रणाली और डिजिटल डिपॉजिटरी का प्रस्ताव रखा।
- ग्लोबल गवर्नेंस सुधार के लिए 10 प्रस्ताव तैयार कर अगली समिट तक ‘ब्रिक्स रिफॉर्म रोडमैप’ बनाने का सुझाव दिया गया।
- समुद्री व्यापार में लगे कर्मचारियों की आपात मदद के लिए ‘सीफारर्स इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क’ बनाने की पहल की गई।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई तकनीकों के नियम तय करने में ग्लोबल साउथ को सशक्त बनाने पर बल दिया गया।
18वें ब्रिक्स सम्मेलन 2026 के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक शासन प्रणालियों में बदलाव का स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत किया। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, भारत में आयोजित इस सम्मेलन की प्राथमिकताओं में ‘रेजिलिएंस, इनोवेशन, कॉपरेशन और सस्टेनेबिलिटी’ शामिल हैं। भारत की अध्यक्षता में देश के 30 शहरों में 350 से अधिक बैठकों का आयोजन किया गया, जिसका मुख्य उद्देश्य ब्रिक्स सहयोग को सामान्य नागरिकों के हितों से जोड़ना रहा है।
ब्रिक्स सम्मेलन 2026 में भारत का मुख्य एजेंडा क्या है?
ब्रिक्स सम्मेलन 2026 में भारत ने ‘पीपुल्स सेंट्रिक’ और ‘ह्यूमैनिटी फर्स्ट’ दृष्टिकोण के तहत वैश्विक शासन सुधारों का प्रस्ताव रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में निष्पक्ष प्रतिनिधित्व, डिजिटल डिपॉजिटरी की स्थापना और वैश्विक नाविकों के लिए एक समर्पित सहायता नेटवर्क बनाने की बात कही।
ब्रिक्स संगठन अपनी स्थापना की 20वीं वर्षगांठ मना रहा है। इसे संगठन की परिपक्वता का चरण बताते हुए भारत ने आग्रह किया कि पिछले दो दशकों में बने सर्वसम्मति के माहौल को अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ठोस नतीजों में बदला जाना चाहिए।
ग्लोबल गवर्नेंस रिफॉर्म्स और 10 सूत्रीय प्रस्ताव
सत्र के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि वर्तमान वैश्विक शासन ढांचा एक पिरामिड की तरह दिखता है। इसमें निर्णय लेने की शक्ति शीर्ष पर बैठे कुछ देशों के पास केंद्रित है, जबकि निचले स्तर पर मौजूद देश इन फैसलों से सीधे प्रभावित होते हैं लेकिन नीति निर्धारण में उनकी कोई भूमिका नहीं होती।
ग्लोबल साउथ के देश वैश्विक संकटों के प्रभाव को सबसे पहले झेलते हैं, लेकिन निर्णय प्रक्रिया में उन्हें पीछे रखा जाता है। इस विशेषाधिकार व्यवस्था को साझेदारी के मंच में बदलने के लिए भारत ने 10 प्रस्तावों पर आधारित ‘ब्रिक्स रिफॉर्म रोडमैप’ तैयार करने का विचार रखा है, जिसे अगले सम्मेलन तक अंतिम रूप दिया जाएगा। इस सुधार प्रक्रिया को तीन प्रमुख स्तंभों पर आधारित किया गया है:
- प्रतिनिधित्व (Representation): संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में समयबद्ध सुधार और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय निकायों में देशों की आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप वोटिंग पावर तय करना।
- संवेदनशीलता (Responsiveness): अंतरराष्ट्रीय संगठनों द्वारा संकट के समय त्वरित, व्यापक और अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुंचाने की क्षमता विकसित करना।
- नियम निर्माण (Rule-making): भविष्य की नई तकनीकों के नियम तय करने में विकासशील देशों की बराबर भागीदारी सुनिश्चित करना।
ब्रिक्स सम्मेलन 2026: संस्थागत निरंतरता के लिए ट्रोइका प्रणाली
ब्रिक्स की अध्यक्षता हर साल बदलती है, लेकिन इससे परियोजनाओं की गति धीमी नहीं होनी चाहिए। इस चुनौती से निपटने के लिए भारत ने ‘BRICS Continuity and Implementation Mechanism’ बनाने का सुझाव दिया। इसके तहत वर्तमान, पूर्व और भावी अध्यक्ष देशों की ‘ट्रोइका’ व्यवस्था के जरिए निर्णयों का फॉलो-अप किया जाएगा।
इसके साथ ही एक सुरक्षित डिजिटल डिपॉजिटरी बनाने का प्रस्ताव रखा गया है। इस प्लेटफॉर्म पर ब्रिक्स द्वारा लिए गए हर फैसले के साथ नोडल अधिकारी, समय-सीमा और क्रियान्वयन की स्थिति दर्ज की जाएगी, जिससे जवाबदेही तय हो सकेगी।
नाविकों के लिए सीफारर्स इमरजेंसी Support Network की पहल
वैश्विक व्यापार में समुद्री नाविकों के योगदान को रेखांकित करते हुए एक विशेष मानवीय पहल की घोषणा की गई। आपात स्थिति या संकट के समय नाविकों को तत्काल सहायता देने के लिए ‘Seafarers Emergency Support Network’ बनाने का प्रस्ताव दिया गया है।
यह नेटवर्क सदस्य देशों की मैरीटाइम अथॉरिटी और राजनयिक मिशनों को आपस में जोड़ेगा। इससे समुद्र में फंसे नाविकों को मेडिकल सहायता, डिस्ट्रेस अलर्ट, परिजनों को तुरंत सूचना और सुरक्षित निकासी (Evacuation) की सुविधा आसानी से मिल सकेगी।
ग्लोबल साउथ को ‘रूल टेकर’ से ‘रूल शेपर’ बनाने की रणनीति
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर स्पेस, आउटर स्पेस, बायोटेक्नोलॉजी और क्रिटिकल टेक्नोलॉजी जैसी उभरती तकनीकें आने वाले समय के वैश्विक नियम तय कर रही हैं। भारत ने कहा कि विकासशील देशों को केवल नियमों का पालन करने वाला (‘रूल टेकर’) नहीं, बल्कि नियम बनाने वाला (‘रूल शेपर’) बनना होगा।
साउथ-साउथ कोऑपरेशन के संयुक्त राष्ट्र दिवस के अवसर पर भारत ने ब्रिक्स के माध्यम से ग्लोबल साउथ के युवा कूटनीतिज्ञों और नीति निर्माताओं के लिए लीगल एक्सपर्टाइज, व्यावहारिक प्रशिक्षण और नेगोशिएशन स्किल्स विकसित करने का जिम्मा उठाने की बात कही।
यह भी जानें: 20 साल में कैसे बदला ब्रिक्स का स्वरूप
वर्ष 2006 में अपनी शुरुआत के बाद से ब्रिक्स ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के एक समूह के रूप में अपनी पहचान बनाई है। शुरुआती दौर में ब्राजील, रूस, भारत और चीन इसके सदस्य थे, जिसमें बाद में दक्षिण अफ्रीका और अन्य देश शामिल हुए। 20 वर्षों के सफर के बाद यह समूह वैश्विक जीडीपी और जनसंख्या के एक बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है।
सर्वसम्मति से फैसले लेने और एक-दूसरे के दृष्टिकोण का सम्मान करने की नीति के कारण ब्रिक्स की प्रासंगिकता लगातार बढ़ी है। भारत का मानना है कि अब समय आ गया है जब यह समूह केवल संवाद का जरिया न रहकर वैश्विक सुधारों को लागू करवाने वाली संस्था के रूप में काम करे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: ब्रिक्स सम्मेलन 2026 में भारत की प्राथमिकताओं के मुख्य बिंदु क्या थे?
उत्तर: भारत ने रेजिलिएंस, इनोवेशन, कॉपरेशन और सस्टेनेबिलिटी को प्राथमिकता देते हुए संस्थागत निरंतरता, नाविक सुरक्षा और वैश्विक शासन सुधारों पर जोर दिया।
प्रश्न: सीफारर्स इमरजेंसी सपोर्ट नेटवर्क क्या है?
उत्तर: यह ब्रिक्स देशों की मैरीटाइम अथॉरिटी का एक प्रस्तावित नेटवर्क है जो समुद्री नाविकों को आपात स्थिति में मेडिकल मदद, अलर्ट और निकासी की सुविधा प्रदान करेगा।
प्रश्न: ब्रिक्स रिफॉर्म रोडमैप किन तीन स्तंभों पर आधारित है?
उत्तर: यह रोडमैप तीन मुख्य पहलुओं- प्रतिनिधित्व (Representation), संवेदनशीलता (Responsiveness) और नियम निर्माण (Rule-making) पर केंद्रित है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






