
शेरशाह सूरी के चांदी के ‘रुपिया’ से लेकर आधुनिक डिजिटल ई-रुपये तक, जानिए भारतीय मुद्रा का 500 वर्षों का पूरा सफर।
मुख्य बातें
- रुपया शब्द का मूल संस्कृत का ‘रौप्य’ है, जिसका अर्थ चांदी होता है।
- 16वीं सदी में शेरशाह सूरी ने 178 ग्रेन वजन का चांदी का सिक्का ‘रुपिया’ जारी किया था।
- 1957 में भारत ने मीट्रिक प्रणाली अपनाकर 1 रुपये को 16 आने के बजाय 100 पैसों में बांटा।
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अधिनियम 1934 की धारा 22 के तहत नोट जारी करने का एकमात्र अधिकार RBI को है।
- वर्ष 2010 में डी. उदय कुमार द्वारा डिजाइन किया गया ₹ प्रतीक आधिकारिक रूप से स्वीकार किया गया।
भारतीय मुद्रा रुपये का इतिहास क्या है?
भारतीय मुद्रा के विकास और परिवर्तन के कालक्रम को रुपये का इतिहास कहा जाता है। इसकी शुरुआत 16वीं शताब्दी में शेरशाह सूरी द्वारा जारी किए गए 178 ग्रेन वजन के चांदी के सिक्के ‘रुपिया’ से हुई थी। समय के साथ 1957 में इसका दशमलव प्रणाली में परिवर्तन हुआ और 2010 में इसे अपना नया प्रतीक चिह्न ₹ मिला।
प्राचीन काल से शेरशाह सूरी तक रुपये का इतिहास
भारत में सिक्कों का प्रयोग प्राचीन काल से ही होता रहा है। मौर्य काल के दौरान कौटिल्य के अर्थशास्त्र में चांदी के सिक्कों को ‘रुपयारूप’ कहा गया है। ‘रुपया’ शब्द का मूल संस्कृत शब्द ‘रौप्य’ से लिया गया है, जिसका शाब्दिक अर्थ चांदी या ढाली गई चांदी होता है। प्राचीन भारत में ‘पण’, ‘काकीणी’ और ‘निशका’ जैसे सिक्कों का लेन-देन में उपयोग किया जाता था।
आधुनिक रुपये की वास्तविक नींव 16वीं सदी में पड़ी। सूरी साम्राज्य के शासक शेरशाह सूरी (1540–1545) ने अपने शासनकाल में एक एकीकृत मौद्रिक प्रणाली शुरू की। उन्होंने 178 ग्रेन (लगभग 11.53 ग्राम) वजन का एक चांदी का सिक्का चलाया, जिसे ‘रुपिया’ नाम दिया गया। शेरशाह सूरी का यह चांदी का रुपया इतना मानक साबित हुआ कि बाद में मुगल साम्राज्य, मराठा साम्राज्य और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी इसी मौद्रिक ढांचे को अपनाए रखा।
ब्रिटिश शासन और कागज़ी मुद्रा की शुरुआत
अंग्रेजों के आगमन के बाद भारत की मौद्रिक प्रणाली में बड़े बदलाव आए। 1835 के यूनिफॉर्म कॉइनेज एक्ट (Uniform Coinage Act 1835) के तहत पूरे ब्रिटिश भारत में एक समान सिक्का प्रणाली लागू की गई। इससे पहले अलग-अलग रियासतों के अपने सिक्के चलते थे, जिससे व्यापार में असुविधा होती थी।
कागजी नोटों की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य में हुई। 1861 के पेपर करंसी एक्ट (Paper Currency Act 1861) के जरिए ब्रिटिश सरकार ने कागजी नोट छापने का एकाधिकार अपने हाथ में ले लिया। इससे पहले बैंक ऑफ बंगाल, बैंक ऑफ बॉम्बे और बैंक ऑफ मद्रास जैसे निजी बैंक अपने-अपने नोट जारी करते थे।
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को हुई। भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 22 के अनुसार, भारत में बैंक नोट जारी करने का एकमात्र कानूनी अधिकार RBI के पास है। हालांकि, 1 रुपये का नोट और सभी छोटे-बड़े सिक्के भारत सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा जारी किए जाते हैं, जिन पर वित्त सचिव के हस्ताक्षर होते हैं। अन्य सभी बड़े नोटों पर आरबीआई के गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं।
आज़ादी के बाद का बदलाव: 16 आने से 100 पैसे तक
1947 में आजादी मिलने के बाद भी कुछ वर्षों तक पुरानी मौद्रिक प्रणाली चलती रही। उस समय 1 रुपया 16 आने में विभाजित था। एक आने में 4 पैसे और 12 पाई होती थीं। यानी 1 रुपया बराबर 64 पैसे हुआ करते थे।
1 अप्रैल 1957 को भारत सरकार ने मौद्रिक प्रणाली का दशमलवकरण (Decimalisation) किया। यह कदम रुपये का इतिहास बदलने वाला साबित हुआ। 16 आने की व्यवस्था समाप्त कर 1 रुपये को 100 ‘नये पैसे’ में विभाजित किया गया। 1964 में ‘नये’ शब्द को हटा दिया गया और इसे केवल ‘पैसा’ कहा जाने लगा।
रुपये का इतिहास और ₹ प्रतीक चिह्न का आगमन
वर्ष 2010 तक भारतीय रुपये का कोई अंतरराष्ट्रीय पहचान चिह्न नहीं था। इसे आमतौर पर ‘Rs’, ‘Re’ या ‘रु’ लिखा जाता था। इस कमी को दूर करने के लिए भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता आयोजित की।
15 जुलाई 2010 को डी. उदय कुमार द्वारा तैयार किए गए प्रतीक चिह्न ‘₹’ को आधिकारिक मंजूरी दी गई। यह प्रतीक देवनागरी के अक्षर ‘र’ और रोमन लिपि के अक्षर ‘R’ का एक अनूठा मिश्रण है। इसमें ऊपर दो क्षैतिज रेखाएं (horizontal lines) बनी हैं, जो भारतीय तिरंगे और समानता के प्रतीक को दर्शाती हैं। इसके साथ ही भारत अमेरिका, ब्रिटेन, जापान और यूरोपीय संघ के बाद अपनी मुद्रा का विशिष्ट प्रतीक रखने वाला पांचवां देश बन गया।
भारतीय रुपये के मुख्य ऐतिहासिक चरण
| समय काल | मुद्रा का रूप | मुख्य बदलाव या विशेषता |
|---|---|---|
| 16वीं सदी (1540-45) | चांदी का ‘रुपिया’ | शेरशाह सूरी द्वारा 178 ग्रेन का चांदी का सिक्का जारी किया गया। |
| 1861 | कागजी नोट (Paper Currency) | ब्रिटिश सरकार द्वारा नोट छापने का एकाधिकार लागू। |
| 1935 | आरबीआई नोट | आरबीआई की स्थापना और धारा 22 के तहत नोट जारी करने का अधिकार। |
| 1957 | दशमलव प्रणाली | 1 रुपया 16 आने के बजाय 100 पैसों में विभाजित हुआ। |
| 2010 | ₹ प्रतीक चिह्न | डी. उदय कुमार द्वारा डिजाइन किया गया नया प्रतीक अपनाया गया। |
| 2022-2026 | ई-रुपया (CBDC) | आरबीआई द्वारा डिजिटल रुपये (Central Bank Digital Currency) की शुरुआत। |
डिजिटल युग और ई-रुपया (e-Rupee)
21वीं सदी में रुपये का इतिहास एक नए डिजिटल दौर में प्रवेश कर चुका है। भारतीय रिजर्व बैंक ने सीबीडीसी (Central Bank Digital Currency) यानी ‘ई-रुपया’ लॉन्च किया है। यह कागजी नोट का ही डिजिटल रूप है, जो ब्लॉकचेन तकनीक पर आधारित है। इसे आप बिना बैंक खाते के भी डिजिटल वॉलेट के माध्यम से एक-दूसरे को ट्रांसफर कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: रुपये शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई है?
उत्तर: रुपया शब्द संस्कृत भाषा के ‘रौप्य’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ चांदी होता है। शेरशाह सूरी ने सबसे पहले चांदी के सिक्के को ‘रुपिया’ नाम दिया था।
प्रश्न 2: भारत में 1 रुपये के नोट पर किसके हस्ताक्षर होते हैं?
उत्तर: 1 रुपये के नोट पर भारत के वित्त सचिव (Finance Secretary) के हस्ताक्षर होते हैं, क्योंकि यह नोट सीधे भारत सरकार द्वारा जारी किया जाता है।
प्रश्न 3: भारत ने 100 पैसे वाली दशमलव प्रणाली कब अपनाई?
उत्तर: भारत ने 1 अप्रैल 1957 को दशमलव प्रणाली अपनाई, जिसके बाद 1 रुपया 16 आने के स्थान पर 100 पैसों के बराबर हो गया।
प्रश्न 4: रुपये के ₹ प्रतीक चिह्न को किसने डिजाइन किया था?
उत्तर: इस प्रतीक चिह्न को प्रोफेसर डी. उदय कुमार ने डिजाइन किया था, जिसे 15 जुलाई 2010 को सरकार ने स्वीकार किया।
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