
मई 2026 में शुरू किए गए भारत समुद्री बीमा पूल ने देश के जहाजों और आयात-निर्यात को विदेशी कंपनियों पर निर्भरता से मुक्त कर स्वदेशी सुरक्षा कवच प्रदान किया है।
मुख्य बातें
- भारत समुद्री बीमा पूल (बीएमआईपी) की कुल राशि 13,906.50 करोड़ रुपये (1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) है।
- इसमें 12,980 करोड़ रुपये (1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर) की सरकारी संप्रभु गारंटी शामिल है।
- पश्चिम एशिया में तनाव के बाद युद्ध-जोखिम बीमा प्रीमियम में 35 से 40 प्रतिशत की गिरावट आई है।
- जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (जीआईसी) इस पूल के प्रबंधक के रूप में कार्य कर रहा है।
भारत समुद्री व्यापार पर अत्यधिक निर्भर है क्योंकि देश का अधिकांश माल और ऊर्जा आयात समुद्री मार्गों के माध्यम से ही संचालित होता है। इसी निर्भरता को सुरक्षित करने के लिए भारत सरकार ने भारत समुद्री बीमा पूल (बीएमआईपी) की स्थापना की है। पीआईबी के अनुसार, यह व्यवस्था उन जहाजों के लिए समुद्री बीमा उपलब्ध कराती है जिन पर भारतीय ध्वज लगा हुआ है अथवा जिनका स्वामित्व या नियंत्रण भारतीय संस्थाओं के हाथ में है।
भारत समुद्री बीमा पूल क्या है और इसके क्या लाभ हैं?
भारत समुद्री बीमा पूल (बीएमआईपी) एक स्वदेशी वित्तीय और बीमा सुरक्षा तंत्र है जिसे 13,906.50 करोड़ रुपये (1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) के कवरेज के साथ शुरू किया गया था। यह जहाज के ढांचे, माल, संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (पीएंडआई) और युद्ध जोखिमों के लिए घरेलू कवरेज देता है, जिससे विदेशी बीमाकर्ताओं पर निर्भरता कम होती है और वैश्विक व्यवधानों के दौरान किफायती कवरेज मिलता है।
देश अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं और कच्चे तेल के आयात के लिए बड़े पैमाने पर समुद्र पर निर्भर है। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे संवेदनशील मार्गों पर भू-राजनीतिक तनाव के चलते विदेशी बीमा कंपनियों ने पहले प्रीमियम बढ़ा दिए थे। इस घरेलू पूल के आने से अब भारतीय जहाजों और आयातकों को संकट के समय भी निरंतर कवरेज मिल रहा है।
पूल की संरचना और वित्तीय सुरक्षा
इस पूल को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करने के लिए विशेष वित्तीय ढांचे के तहत डिजाइन किया गया है। इसमें सरकार की ओर से मजबूत सहयोग दिया गया है ताकि बड़े दावों का निपटान आसानी से हो सके।
- 12,980 करोड़ रुपये (1.4 बिलियन अमेरिकी डॉलर) की संप्रभु गारंटी।
- 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर तक के दावों का निपटान आरक्षित निधियों और पुनर्बीमा से।
- जनरल इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (जीआईसी) द्वारा पूल का प्रबंधन और संचालन।
- 10 वर्ष की शुरुआती अवधि जिसे 15 वर्षों तक बढ़ाया जा सकता है।
समुद्री क्षेत्र में इसका क्या असर पड़ा है
इस व्यवस्था के लागू होने के बाद से भारतीय समुद्री हितधारकों को सीधा लाभ मिला है। पश्चिम एशिया में टकराव के बाद युद्ध-जोखिम बीमा प्रीमियम में लगभग 35 से 40 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 7 सितंबर 2026 तक इस पूल के माध्यम से हजारों माल युद्ध जोखिम और जलपोत ढांचा नीतियां जारी की जा चुकी हैं।
पारंपरिक रूप से भारतीय जहाज मालिक पश्चिमी देशों के 13 अंतरराष्ट्रीय पीएंडआई क्लबों पर निर्भर थे, जिससे अचानक कवरेज वापस लिए जाने का जोखिम बना रहता था। अब देश के भीतर ही शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड और अन्य निजी कंपनियों को स्वदेशी नीतियां मिलने लगी हैं।
भविष्य की योजनाएं और क्षेत्रीय प्रभाव
मध्यम अवधि में इस पूल का उद्देश्य मानव पूंजी और पुनर्बीमा साझेदारियों को मजबूत करना है ताकि सरकारी सहायता पर निर्भरता घटाई जा सके। लंबी अवधि में यह पहल हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री बीमा के लिए एक क्षेत्रीय आधार के रूप में उभर रही है, जिससे भारत एक प्रमुख वित्तीय सेवा प्रदाता बन रहा है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? भारत समुद्री बीमा पूल की शुरुआत कब हुई थी?
उत्तर। इसे मई 2026 में औपचारिक रूप से शुरू किया गया था।
प्रश्न? इसके तहत किस तरह के जोखिमों का बीमा किया जाता है?
उत्तर। इसमें जहाज का ढांचा और मशीनरी, माल, युद्ध जोखिम तथा संरक्षण एवं क्षतिपूर्ति (पीएंडआई) शामिल हैं।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






