गुरूवार, सितम्बर 3, 2026

ड्रग डिलीवरी रिसर्च में बड़ी सफलता: आरआरआई वैज्ञानिकों ने खोजा नया तरीका

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ड्रग डिलीवरी रिसर्च

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने तापमान में अचानक बदलाव कर माइक्रोजेल की संरचना नियंत्रित करने में सफलता हासिल की, जिससे कैंसर और ट्यूमर के इलाज में मदद मिलेगी।

मुख्य बातें

  • रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने थर्मल शॉक के जरिए माइक्रोजेल की अव्यवस्थित संरचनात्मक याददाश्त मिटाने का तरीका खोजा।
  • माइक्रोजेल कण अपने वजन से 300 से 500 गुना अधिक पानी सोख सकते हैं और 4 डिग्री सेल्सियस पर महीनों तक स्थिर रहते हैं।
  • 34 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान मिलने पर यह माइक्रोजेल सिकुड़कर ट्यूमर जैसे लक्षित स्थान पर दवा रिलीज करता है।
  • यह शोध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका ‘जर्नल ऑफ कोलाइड एंड इंटरफेस साइंस’ में प्रकाशित हुआ है।

भारतीय वैज्ञानिकों ने ड्रग डिलीवरी रिसर्च के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण तकनीकी सफलता हासिल की है। रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (आरआरआई) के शोधकर्ताओं ने तापमान में अचानक बदलाव यानी थर्मल शॉक देकर कांच जैसे जमे हुए पदार्थों की संरचनात्मक याददाश्त को मिटाने और उन्हें कुछ समय के लिए तरल अवस्था में लाने का तरीका खोज निकाला है।

ड्रग डिलीवरी रिसर्च में रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट ने क्या नई खोज की है?

ड्रग डिलीवरी रिसर्च के तहत रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों ने माइक्रोजेल कणों के माध्यम से जमे हुए सिस्टम की संरचना को नियंत्रित करने में सफलता प्राप्त की है। तापमान में तेजी से बदलाव करने पर कण खुद को पुनर्व्यवस्थित कर लेते हैं, जिससे सामग्री की अव्यवस्थित याददाश्त मिट जाती है। यह प्रणाली शरीर के लक्षित हिस्सों तक दवा को बिना किसी दुष्प्रभाव के सटीक रूप से पहुंचाने में सहायता करेगी।

माइक्रोजेल कण और प्रायोगिक प्रक्रिया

आरआरआई की शोधार्थी और इस अध्ययन की मुख्य लेखिका सोनाली कवाले ने माइक्रोजेल कणों को बेहद सघनता से भरकर उन्हें कांच जैसे सख्त पदार्थ की तरह व्यवहार करने के लिए तैयार किया। माइक्रोजेल एक ऐसा पदार्थ है जो अपने स्वयं के वजन से 300 से 500 गुना अधिक पानी सोखने की क्षमता रखता है। इसका उपयोग सामान्यतः सैनिटरी नैपकिन और डायपर बनाने में भी किया जाता है।

शोधकर्ताओं ने तीन-गर्दन वाले गोल-तल फ्लास्क में माइक्रोजेल तैयार करके उन्हें बारीक पाउडर में पीसा। फिर इसमें पानी मिलाकर सस्पेंशन बनाया गया, जिसे 24 घंटे तक हिलाया गया और 15 मिनट तक ध्वनि तरंगों यानी सोनिकेट की मदद से हिलाया गया। इस तैयार घोल को 4 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रेफ्रिजरेटर में महीनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। ड्रग डिलीवरी रिसर्च में यह स्थिरता बेहद उपयोगी मानी जाती है।

थर्मल शॉक और स्ट्रक्चरल रिकवरी का सिद्धांत

जब कांच या घने माइक्रोजेल जैसे पदार्थों को गर्म या ठंडा किया जाता है, तो वे एक ही रास्ते का अनुसरण नहीं करते हैं। गर्म करने और ठंडा करने की प्रक्रियाओं के बीच एक स्पष्ट विषमता पाई जाती है। शोध की सह-लेखिका रंजिनी बंद्योपाध्याय के अनुसार, जब इन कणों को अत्यधिक दबाकर रखा जाता है, तो वे स्वतंत्र रूप से घूम नहीं पाते और अपनी न्यूनतम ऊर्जा स्थिति में पहुंचने का प्रयास करते हैं। इस प्रक्रिया को संरचना का ठीक होना या स्ट्रक्चरल रिकवरी कहा जाता है।

वैज्ञानिकों ने पाया कि जब तापमान बढ़ाने की गति को अचानक तेज किया गया, तो सिस्टम में मौजूद रुकावट या जाम अस्थायी रूप से बहने वाली अवस्था में बदल गया। तापमान में अचानक इस बड़े बदलाव से गर्म और ठंडा होने के अलग-अलग रास्तों की याददाश्त मिट गई। इससे सामग्री के भीतर की असमानताएं समाप्त हो गईं, जिसे पहले नियंत्रित करना संभव नहीं था। यह सिद्धांत ड्रग डिलीवरी रिसर्च को व्यावहारिक रूप से लागू करने में मदद करेगा।

ड्रग डिलीवरी रिसर्च से कैंसर और ट्यूमर इलाज में सुधार

इस शोध के परिणाम चिकित्सा क्षेत्र, विशेष रूप से लक्षित दवा छिड़काव में अत्यंत कारगर साबित हो सकते हैं। ठंडे तापमान में माइक्रोजेल कणों के भीतर दवा भरी जाती है, जिससे वे जेली की तरह फूल जाते हैं। जब इन्हें मानव शरीर में प्रवेश कराया जाता है और तापमान 34 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचता है, तो ये माइक्रोजेल कण सिकुड़ने लगते हैं।

शरीर के सामान्य तापमान के निकट पहुंचते ही माइक्रोजेल सिकुड़कर ट्यूमर या प्रभावित क्षेत्र पर दवा को बाहर निकाल देते हैं। इस प्रकार ड्रग डिलीवरी रिसर्च के माध्यम से दवा को केवल बीमार कोशिकाओं तक ही सीमित रखा जा सकता है। इससे स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं पहुंचता और कैंसर रोधी दवाओं के दुष्परिणामों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट का वैज्ञानिक योगदान और भविष्य का लक्ष्य

रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) का एक स्वायत्त संस्थान है। आरआरआई के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ‘जर्नल ऑफ कोलाइड एंड इंटरफेस साइंस’ में प्रकाशित हुआ है। ड्रग डिलीवरी रिसर्च के इस चरण के बाद वैज्ञानिक अब मैकेनिकल शॉक और थर्मल शॉक की तुलना पर अध्ययन करेंगे।

आगामी अध्ययनों में शोधकर्ता यह जांच करेंगे कि यांत्रिक दबाव यानी मैकेनिकल शॉक का इस्तेमाल करके फंसे हुए सिस्टम को किस तरह नियंत्रित किया जा सकता है। ड्रग डिलीवरी रिसर्च के इस नए आयाम से बायोमेडिकल सामग्री, लचीली जैविक संरचनाओं और स्मार्ट कोटिंग्स के निर्माण में नई संभावनाएं खुलेंगी।

अनुसंधान से जुड़े मुख्य तथ्य और आंकड़े

ड्रग डिलीवरी रिसर्च से जुड़े मुख्य तकनीकी और प्रायोगिक बिंदु नीचे दिए गए हैं:

  • शोध संस्थान: रमन रिसर्च इंस्टिट्यूट (डीएसटी का स्वायत्त संस्थान), बेंगलुरु।
  • प्रमुख वैज्ञानिक: पहली लेखिका सोनाली कवाले और सह-लेखिका रंजिनी बंद्योपाध्याय।
  • शोध पत्रिका: जर्नल ऑफ कोलाइड एंड इंटरफेस साइंस (DOI: 10.1016/j.jcis.2026.139830)।
  • माइक्रोजेल क्षमता: अपने वजन से 300 से 500 गुना अधिक पानी सोखने में सक्षम।
  • दवा रिलीज तापमान: 34 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान होने पर सिकुड़कर दवा छोड़ता है।
  • भंडारण तापमान: तैयार सस्पेंशन को 4 डिग्री सेल्सियस पर महीनों तक स्थिर रखा जा सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: ड्रग डिलीवरी रिसर्च में थर्मल शॉक का क्या उपयोग है?
उत्तर: थर्मल शॉक यानी तापमान में अचानक बदलाव के जरिए माइक्रोजेल की अव्यवस्थित याददाश्त को मिटाकर उसे तरल रूप दिया जाता है, जिससे दवा को सटीक स्थान पर छोड़ा जा सके।

प्रश्न: माइक्रोजेल दवा को शरीर में कब और कैसे रिलीज करता है?
उत्तर: 34 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान मिलने पर माइक्रोजेल सिकुड़ जाता है और ट्यूमर या बीमार अंग के पास जाकर दवा छोड़ देता है।

प्रश्न: ड्रग डिलीवरी रिसर्च से मरीजों को क्या लाभ होगा?
उत्तर: इससे दवा सीधे प्रभावित अंग तक पहुंचेगी, जिससे दवा की मात्रा कम लगेगी और शरीर पर इसके साइड इफेक्ट्स बहुत कम होंगे।

यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com

सौरभ तिवारी
सौरभ तिवारी
सौरभ तिवारी आज पत्रिका में राष्ट्रीय एवं राजनीतिक मामलों के संपादक हैं। वे संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही, सरकारी नीतियों, चुनाव, और भारत से जुड़ी बड़ी राष्ट्रीय खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। उनका ज़ोर तथ्य-आधारित, संतुलित और स्रोत-सहित रिपोर्टिंग पर रहता है — हर लेख में वे प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), संबंधित मंत्रालयों की विज्ञप्तियों और आधिकारिक दस्तावेज़ों का हवाला देते हैं। राय और विश्लेषण को वे समाचार से स्पष्ट रूप से अलग रखते हैं। सुझाव या तथ्य-सुधार के लिए: corrections@aajpatrika.com।

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