
भारतीय रिज़र्व बैंक ने ग्रामीण सहकारी बैंकों के केवाईसी निर्देशों में संशोधन किया है, जिससे विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को दस्तावेजों के सत्यापन में राहत मिलेगी।
मुख्य बातें
- आरबीआई ने ग्रामीण सहकारी बैंकों के लिए केवाईसी संशोधन निर्देश 2026 तत्काल प्रभाव से लागू कर दिए हैं।
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) को अब अनिवासी भारतीयों की तरह विदेशी प्राधिकारियों से प्रमाणित केवाईसी कॉपी जमा करने की अनुमति दी गई है।
- विदेश में स्थित भारतीय दूतावास, नोटरी पब्लिक, जज या कोर्ट मजिस्ट्रेट द्वारा सत्यापित प्रतियां मान्य होंगी।
- यह संशोधन बैंक नियमन अधिनियम 1949 और धन शोधन निवारण नियमों के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए किया गया है।
भारतीय रिज़र्व बैंक ने ग्रामीण सहकारी बैंकों के संचालन को अधिक सुगम बनाने के लिए आरबीआई केवाईसी नियम के तहत संशोधन निर्देश जारी किए हैं। 18 सितंबर 2026 को जारी इस अधिसूचना के अनुसार, रिज़र्व बैंक ने ग्रामीण सहकारी बैंकों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए पहचान सत्यापन संबंधी नियमों को आसान कर दिया है। यह नया निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है और देश भर के सभी पात्र ग्रामीण सहकारी बैंकों पर प्रभावी होगा।
आरबीआई केवाईसी नियम 2026 में क्या बदलाव हुए हैं?
भारतीय रिज़र्व बैंक के आरबीआई केवाईसी नियम 2026 संशोधन के तहत ग्रामीण सहकारी बैंकों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए केवाईसी दस्तावेजों के सत्यापन की प्रक्रिया को आसान बनाया गया है। अब एफपीआई भी अनिवासी भारतीयों (NRIs) और भारतीय मूल के व्यक्तियों (PIOs) की तरह विदेशी दूतावासों, नोटरी पब्लिक या भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं से सत्यापित केवाईसी दस्तावेज जमा कर सकेंगे।
रिज़र्व बैंक की मुख्य महाप्रबंधक वीणा श्रीवास्तव द्वारा हस्ताक्षरित इस आदेश में बताया गया है कि 28 नवंबर 2025 को जारी मूल ‘ग्रामीण सहकारी बैंक – ग्राहक को जानिए निर्देश 2025’ के पैराग्राफ 4(1)(v) को प्रतिस्थापित किया गया है। पुराने दिशानिर्देशों में केवल एनआरआई और पीआईओ ग्राहकों के लिए विदेशी अधिकारियों से दस्तावेज सत्यापित कराने का विकल्प था। अब इस समीक्षा के बाद रिज़र्व बैंक ने यह सुविधा एफपीआई के लिए भी विस्तारित कर दी है।
ग्रामीण सहकारी बैंकों में आरबीआई केवाईसी नियम का नया प्रावधान
नए संशोधन के अनुसार, बैंकों के लिए ‘प्रमाणित प्रति’ (Certified Copy) का अर्थ उस प्रक्रिया से है जिसमें बैंक का कोई अधिकृत अधिकारी ग्राहक द्वारा प्रस्तुत किए गए मूल दस्तावेज से उसकी प्रति की तुलना करता है और उस पर अपनी पुष्टि दर्ज करता है। यह व्यवस्था मुख्य रूप से तब लागू होती है जब आधार संख्या का ऑफलाइन सत्यापन संभव न हो।
हालाँकि, विदेशी ग्राहकों और निवेशकों के लिए इस प्रक्रिया में छूट दी गई है। नए नियमों के अंतर्गत निम्नलिखित विदेशी संस्थाएं और ग्राहक मूल सत्यापित प्रति जमा कर सकते हैं:
- foreign portfolio investors (FPIs) – विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक
- Non-Resident Indians (NRIs) – अनिवासी भारतीय
- Persons of Indian Origin (PIOs) – भारतीय मूल के व्यक्ति
प्रमाणित प्रति जारी करने के लिए कौन-कौन से अधिकारी अधिकृत हैं?
रिज़र्व बैंक के इस नए संशोधन के तहत यदि कोई विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक या गैर-निवासी ग्राहक भारत में आए बिना अपने दस्तावेज जमा करना चाहता है, तो उसके पास निर्दिष्ट अधिकारियों द्वारा प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करने का विकल्प होगा। बैंक निम्नलिखित प्राधिकारियों द्वारा सत्यापित प्रतियां स्वीकार कर सकते हैं:
- भारत में पंजीकृत अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की विदेश स्थित शाखाओं के अधिकृत अधिकारी।
- विदेशी बैंकों की वे शाखाएं जिनके साथ भारतीय बैंकों का कारोबारी या बैकिंग संबंध (Correspondent Relationship) है।
- विदेश में कार्यरत नोटरी पब्लिक (Notary Public abroad)।
- संबंधित देश के कोर्ट मजिस्ट्रेट (Court Magistrate)।
- विदेश में नियुक्त जज (Judge)।
- जिस देश में गैर-निवासी ग्राहक निवास कर रहा है, वहां स्थित भारतीय दूतावास या महावाणिज्य दूतावास (Indian Embassy / Consulate General)।
इसके पीछे का कानूनी ढांचा और अधिनियम
रिज़र्व बैंक ने यह संशोधन कई वित्तीय कानूनों और अधिनियमों के तहत मिले अधिकारों का उपयोग करते हुए किया है। इन निर्देशों को जारी करने के लिए केंद्रीय बैंक ने बैंक नियमन अधिनियम 1949 की धारा 35A और धारा 56 का सहारा लिया है। इसके अलावा भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम 2007 की धारा 10(2) और धारा 18 के तहत मिली शक्तियों का भी प्रयोग किया गया है।
विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम 1999 (FEMA) की धारा 11(1) और धन शोधन निवारण (अभिलेखों का रखरखाव) नियम 2005 के नियम 9(14) के तहत इन संशोधनों को अधिसूचित किया गया है। रिज़र्व बैंक का मानना है कि सार्वजनिक हित में और बैंकिंग प्रणाली को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप सुरक्षित रखने के लिए यह संशोधन आवश्यक था।
ग्रामीण सहकारी बैंकों और निवेशकों पर इसका प्रभाव
इस बदलाव का सीधा असर ग्रामीण सहकारी बैंकों में खाता खोलने और वित्तीय लेनदेन करने वाले विदेशी संस्थागत निवेशकों पर पड़ेगा। पहले एफपीआई के लिए दस्तावेजी सत्यापन की प्रक्रिया काफी जटिल थी, क्योंकि उन्हें सीधे भारतीय बैंक शाखाओं में सत्यापन के लिए भौतिक दस्तावेज पेश करने पड़ते थे। अब इस विकल्प के उपलब्ध हो जाने से दूरदराज के क्षेत्रों में काम करने वाले ग्रामीण सहकारी बैंकों को भी अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से जुड़ने में आसानी होगी।
गैर-निवासी ग्राहकों को अब बार-बार भारत आने या जटिल भौतिक सत्यापन प्रक्रियाओं से गुजरने की आवश्यकता नहीं होगी। वे जिस देश में रह रहे हैं, वहीं के स्थानीय भारतीय दूतावास या नोटरी पब्लिक से अपने पहचान पत्र और पते के प्रमाण सत्यापित करवाकर बैंकों को भेज सकेंगे। इससे बैंकों का प्रशासनिक समय बचेगा और धन शोधन रोधी (Anti-Money Laundering) नियमों का कड़ाई से पालन भी सुनिश्चित होगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: आरबीआई केवाईसी नियम 2026 का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इस संशोधन का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण सहकारी बैंकों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) के लिए केवाईसी दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया को आसान बनाना और उन्हें अनिवासी भारतीयों के समान सत्यापन सुविधा प्रदान करना है।
प्रश्न: क्या यह नया केवाईसी नियम तुरंत प्रभाव से लागू हो गया है?
उत्तर: जी हां, रिज़र्व बैंक की अधिसूचना के अनुसार यह निर्देश 18 सितंबर 2026 से तुरंत प्रभाव से लागू हो गए हैं।
प्रश्न: एफपीआई के दस्तावेज कौन सत्यापित कर सकता है?
उत्तर: विदेश में स्थित भारतीय दूतावास, नोटरी पब्लिक, कोर्ट मजिस्ट्रेट, जज, या भारतीय बैंकों की विदेशी शाखाओं के अधिकृत अधिकारी एफपीआई के केवाईसी दस्तावेज सत्यापित कर सकते हैं।
यह रिपोर्ट RBI (भारतीय रिज़र्व बैंक) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: RBI (भारतीय रिज़र्व बैंक)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






