शनिवार, अक्टूबर 17, 2026

परिसीमन क्या है? जानिए भारत में चुनाव क्षेत्रों के पुनर्गठन की प्रक्रिया

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परिसीमन क्या है

परिसीमन का अर्थ, संवैधानिक आधार, आयोग के अधिकार और उत्तर-दक्षिण राज्यों के बीच राजनीतिक बहस का पूरा गणित समझें।

मुख्य बातें

  • परिसीमन का अर्थ चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं को आबादी के हिसाब से तय करना है।
  • भारत में संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत परिसीमन आयोग का गठन होता है।
  • 84वें संविधान संशोधन के तहत लोकसभा सीटों की संख्या पर 2026 तक रोक लगाई गई है।
  • परिसीमन आयोग के फैसलों को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।

परिसीमन क्या है, इसका सीधा संबंध भारत की लोकतांत्रिक निर्वाचन व्यवस्था से है। जब किसी देश या राज्य की आबादी में समय के साथ बदलाव आता है, तो चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं का नया दायरा तय करना पड़ता है। इसी कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया को परिसीमन या डेलिमिटेशन (Delimitation) कहा जाता है।

परिसीमन क्या है?

परिसीमन क्या है, इसका उत्तर यह है कि यह भारत में जनसंख्या के नवीनतम आंकड़ों के आधार पर लोकसभा और राज्य विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया है। इसका मुख्य उद्देश्य हर सांसद या विधायक के चुनावी क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या को जहां तक संभव हो, समान बनाना है।

परिसीमन आयोग की संरचना और संवैधानिक आधार

भारत में परिसीमन का काम कोई सरकार या राजनीतिक दल नहीं करता, बल्कि इसके लिए एक स्वतंत्र निकाय बनाया जाता है जिसे परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) कहते हैं।

  • संविधान का अनुच्छेद 82: संसद को यह अधिकार देता है कि हर जनगणना के बाद एक परिसीमन अधिनियम लागू करे।
  • संविधान का अनुच्छेद 170: राज्यों की विधानसभाओं के लिए जनगणना के बाद क्षेत्रों के समायोजन का प्रावधान करता है।
  • आयोग की संरचना: इसमें उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश अध्यक्ष होते हैं। इसके अलावा भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्यों के चुनाव आयुक्त इसके सदस्य होते हैं।

परिसीमन आयोग के आदेशों का प्रभाव कानून जैसा होता है। आयोग द्वारा तय की गई सीमाओं और सीटों के फैसले को किसी भी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। संसद या राज्य विधानसभाएं भी इन आदेशों में कोई संशोधन नहीं कर सकतीं।

भारत में परिसीमन की आवश्यकता क्यों होती है?

लोकतंत्र में ‘एक नागरिक, एक वोट और एक मूल्य’ का नियम चलता है। समय के साथ किसी क्षेत्र की आबादी बढ़ती है तो किसी क्षेत्र में प्रवास के कारण आबादी कम हो जाती है। यदि परिसीमन न हो तो कुछ सांसदों के क्षेत्र में 10 लाख मतदाता होंगे और कुछ में 30 लाख, जो असमानता पैदा करता है।

इसके अलावा, अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण भी परिसीमन के दौरान ही होता है। जिस क्षेत्र में इन वर्गों की आबादी अधिक होती है, वहां उनके लिए सीटें आरक्षित की जाती हैं।

भारत में परिसीमन का इतिहास और 2026 का गणित

भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोग का गठन किया जा चुका है— 1952, 1963, 1973 और 2002 में।

वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा लोकसभा और विधानसभा सीटों की कुल संख्या को 1971 की जनगणना के आधार पर 2001 तक के लिए फ्रीज (स्थगित) कर दिया गया था। इसका मकसद राज्यों को परिवार नियोजन कार्यक्रमों को लागू करने के लिए प्रोत्साहित करना था।

वर्ष 2001 में 84वें संविधान संशोधन के जरिए इस पाबंदी को 2026 तक बढ़ा दिया गया। इसका अर्थ यह है कि वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े आने तक लोकसभा की कुल सीटें 543 ही रहेंगी। हालांकि, 2002 के परिसीमन आयोग ने कुल सीटों की संख्या बदले बिना 2001 की जनगणना के आधार पर चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन ज़रूर किया था।

उत्तर बनाम दक्षिण भारत: परिसीमन पर राजनीतिक बहस

आगामी परिसीमन को लेकर भारतीय राजनीति में गहरी बहस छिड़ी हुई है। इसका कारण उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों की जनसंख्या वृद्धि दर में अंतर है।

मान लीजिए कि दक्षिण के राज्य तमिलनाडू या केरल ने परिवार नियोजन के जरिए अपनी जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण पा लिया, जबकि उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी। यदि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर नई सीटें बांटी गईं, तो उत्तर भारत के राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या बहुत अधिक बढ़ जाएगी और दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व संसद में घट जाएगा।

इसी वजह से दक्षिण भारतीय राज्य यह मांग करते रहे हैं कि जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम करने वाले राज्यों को सीटों के आवंटन में नुकसान नहीं होना चाहिए।

पहलूविवरण
मुख्य संस्थाभारत का परिसीमन आयोग (Delimitation Commission)
संवैधानिक प्रावधानअनुच्छेद 82 (लोकसभा) और अनुच्छेद 170 (विधानसभा)
अंतिम परिसीमन आयोगवर्ष 2002 (2001 जनगणना के आधार पर)
सीटों पर फ्रीज की अवधिवर्ष 2026 के बाद पहली जनगणना तक
न्यायिक समीक्षाआदेशों को किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती

परिसीमन क्या है और यह प्रक्रिया कैसे पूरी होती है?

  1. संसद द्वारा कानून बनाना: जनगणना के आंकड़े आने के बाद संसद परिसीमन अधिनियम पारित करती है।
  2. आयोग का गठन: राष्ट्रपति द्वारा परिसीमन आयोग की नियुक्ति की जाती है।
  3. आंकड़ों और मानचित्रों का विश्लेषण: आयोग प्रत्येक जिले और तहसील के आधार पर जनसंख्या के आंकड़े एकत्र करता है।
  4. प्रारूप (Draft) तैयार करना: क्षेत्रों की नई सीमाओं और आरक्षित सीटों का मसौदा तैयार किया जाता है।
  5. जनता से सुझाव और आपत्तियां: मसौदे को भारत के राजपत्र में प्रकाशित करके जनता और राजनीतिक दलों से आपत्तियां मांगी जाती हैं।
  6. सार्वजनिक सुनवाई: आयोग विभिन्न राज्यों में जाकर सार्वजनिक सुनवाई आयोजित करता है।
  7. अंतिम राजपत्र अधिसूचना: संशोधन के बाद अंतिम आदेश राष्ट्रपति की मंजूरी से लागू होता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न 1: परिसीमन आयोग के फैसले को अदालत में चुनौती क्यों नहीं दी जा सकती?
उत्तर: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत परिसीमन आयोग को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखा गया है, ताकि चुनाव प्रक्रिया समय पर पूरी हो सके और अंतहीन कानूनी मुकदमों में न फंसे।

प्रश्न 2: क्या परिसीमन से लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ जाएगी?
उत्तर: 2026 के बाद होने वाले परिसीमन में नई जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की कुल संख्या 543 से बढ़कर 800 या उससे अधिक होने का अनुमान है, जिस पर संसद द्वारा निर्णय लिया जाएगा।

प्रश्न 3: परिसीमन और पुनर्गठन में क्या अंतर है?
उत्तर: परिसीमन में क्षेत्रों की भौगोलिक सीमाएं और सीटों की संख्या तय होती है, जबकि पुनर्गठन आमतौर पर राज्यों या जिलों के प्रशासनिक ढांचे में बदलाव से जुड़ा होता है।

यह लेख भारत में संवैधानिक और चुनावी प्रक्रियाओं की सामान्य जानकारी के लिए तैयार किया गया है। परिसीमन संबंधी नियमों, अधिसूचनाओं और आधिकारिक ब्योरे के लिए भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक वेबसाइट eci.gov.in पर जांच करें।

आधिकारिक जानकारी और नवीनतम अपडेट के लिए: https://eci.gov.in

यह लेख आज पत्रिका की एक्सप्लेनर डेस्क द्वारा सामान्य जागरूकता के लिए तैयार किया गया है। नियम और प्रक्रियाएं समय-समय पर बदल सकती हैं — कृपया आधिकारिक स्रोत से पुष्टि करें। सुधार/सुझाव: corrections@aajpatrika.com

सौरभ तिवारी
सौरभ तिवारी
सौरभ तिवारी आज पत्रिका में राष्ट्रीय एवं राजनीतिक मामलों के संपादक हैं। वे संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही, सरकारी नीतियों, चुनाव, और भारत से जुड़ी बड़ी राष्ट्रीय खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। उनका ज़ोर तथ्य-आधारित, संतुलित और स्रोत-सहित रिपोर्टिंग पर रहता है — हर लेख में वे प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), संबंधित मंत्रालयों की विज्ञप्तियों और आधिकारिक दस्तावेज़ों का हवाला देते हैं। राय और विश्लेषण को वे समाचार से स्पष्ट रूप से अलग रखते हैं। सुझाव या तथ्य-सुधार के लिए: corrections@aajpatrika.com।

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