
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने 27 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों को 1.04 करोड़ रुपये की एबीएस राशि वितरित की है। उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक फंड आवंटित हुआ है।
मुख्य बातें
- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने 27 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों को 1,03,63,188 रुपये की एबीएस राशि वितरित की।
- उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक ₹10,35,790, महाराष्ट्र को ₹10,05,218 और मध्य प्रदेश को ₹9,81,132 का आवंटन हुआ।
- यह फंड क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन, सवाना सीड्स और ननहेम्स इंडिया जैसी बीज व कृषि कंपनियों के लाभ-साझाकरण से जुटाया गया है।
- आवंटन के लिए कृषि मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल से प्राप्त बोए गए फसल क्षेत्र के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया।
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने देश भर में पर्यावरण संरक्षण को सुदृढ़ करने के लिए जैविक विविधता फंड से लगभग 1.04 करोड़ रुपये की पहुंच और लाभ-साझाकरण (ABS) राशि वितरित की है। यह राशि 27 राज्य जैव विविधता बोर्डों और दो केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषदों के बीच बांटी गई है। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, यह कोष कृषि जैविक संसाधनों का उपयोग करने वाली निजी बीज व शोध कंपनियों से जुटाया गया है।
जैविक विविधता फंड क्या है और राज्यों को कितना पैसा मिला?
जैविक विविधता फंड से राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने 27 राज्य जैव विविधता बोर्डों और 2 केंद्र शासित प्रदेशों को कुल 1,03,63,188 रुपये बांटे हैं। यह राशि कृषि संबंधी जैविक संसाधनों के व्यावसायिक और शोध उपयोग से मिली एबीएस फीस है, जिसे स्थानीय पर्यावरण, पारंपरिक बीजों और देसी फसलों के संरक्षण पर खर्च किया जाएगा।
प्राधिकरण ने फंड के राज्यवार आवंटन के लिए पारदर्शी व्यवस्था लागू की है। इस वितरण सूची में उत्तर प्रदेश शीर्ष स्थान पर है, जिसे 10,35,790 रुपये मिले हैं। इसके बाद महाराष्ट्र को 10,05,218 रुपये और मध्य प्रदेश को 9,81,132 रुपये जारी किए गए हैं।
शीर्ष 10 राज्यों और अन्य क्षेत्रों को मिला आवंटन इस प्रकार है:
- उत्तर प्रदेश: ₹10,35,790
- महाराष्ट्र: ₹10,05,218
- मध्य प्रदेश: ₹9,81,132
- बिहार: ₹7,95,968
- पश्चिम बंगाल: ₹7,91,609
- कर्नाटक: ₹7,34,400
- तेलंगाना: ₹5,76,934
- छत्तीसगढ़: ₹5,20,524
- ओडिशा: ₹4,99,655
- राजस्थान: ₹4,87,874
- अन्य राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश: ₹29,34,084
जैविक विविधता फंड में किन कंपनियों का योगदान है?
पीआईबी की रिपोर्ट के मुताबिक यह राशि क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड, सवाना सीड्स प्राइवेट लिमिटेड और ननहेम्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड से प्राप्त हुई है। इन कंपनियों ने वाणिज्यिक और अनुसंधान उद्देश्यों के लिए भारत की पारंपरिक फसलों के जैविक संसाधनों का इस्तेमाल किया था।
जिन फसलों के आनुवंशिक संसाधनों का उपयोग हुआ, उनमें बाजरा (पेनिसेटम ग्लुकम), ज्वार (ज्वार बाइकलर), मक्का (जी मेज), चावल (ओरिजा सैटिवा एल) और लौकी (लेजेनेरिया सिसेरिया) शामिल हैं। ये फसलें भारत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए बेहद बुनियादी मानी जाती हैं।
आवंटन की क्षेत्र-आधारित कार्यप्रणाली कैसे काम करती है?
पहले जैविक संसाधन व्यापारियों, स्थानीय बाजारों और बिचौलियों के जरिए जुटाए जाते थे। इस वजह से किस किसान या किस विशिष्ट गांव के जैविक संसाधनों का उपयोग हुआ है, यह तय करना व्यावहारिक रूप से बहुत कठिन था। इस चुनौती से निपटने के लिए एनबीए की विशेषज्ञ समिति ने एक क्षेत्र-आधारित मॉडल तैयार किया।
इस मॉडल के तहत कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल के आधिकारिक आंकड़ों की मदद ली गई। जिस राज्य में संबंधित फसल का जितना अनुमानित बोया गया क्षेत्रफल दर्ज था, उसी अनुपात में फंड का हिस्सा निर्धारित किया गया।
एबीएस प्रणाली का दायरा और भारत का अब तक का प्रदर्शन
कृषि क्षेत्र भारत के एबीएस (Access and Benefit-Sharing) तंत्र का एक बड़ा सहारा बनकर उभरा है। केवल कृषि क्षेत्र से ही एबीएस योगदान के रूप में अब तक लगभग 87 करोड़ रुपये (9.16 मिलियन डॉलर) एकत्र किए जा चुके हैं।
सम्पूर्ण राष्ट्रीय आंकड़ों की बात करें तो राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण अब तक कुल मिलाकर 204 करोड़ रुपये (21.48 मिलियन डॉलर) से अधिक की एबीएस राशि जारी कर चुका है। यह पैसा राज्य स्तर पर जमीनी पर्यावरण संरक्षण और शोध कार्यों में लगाया जा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय मंच और सीबीडी सीओपी 17 सम्मेलन
भारत का एबीएस मॉडल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैविक विविधता पर सम्मेलन (CBD) और नागोया प्रोटोकॉल के लक्ष्यों के अनुकूल है। यह व्यवस्था कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढांचे के लक्ष्य 13 का भी समर्थन करती है।
भारत 28 अक्टूबर 2026 को आर्मेनिया के येरेवन में आयोजित होने वाले सीबीडी सीओपी 17 (CBD COP 17) के विशेष कार्यक्रम में अपने इस अनुभव को दुनिया के सामने रखेगा। इस कार्यक्रम का विषय ‘नीति से अभ्यास तक: नवाचार, वित्त और एबीएस के माध्यम से भारत की जैव विविधता प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाना’ रखा गया है।
जैविक विविधता फंड का इस्तेमाल किन कामों में होगा?
जैविक विविधता अधिनियम 2002 (2023 में संशोधित), जैविक विविधता नियम 2024 और एबीएस विनियम 2025 की धारा 21 के तहत प्राप्त राशि का इस्तेमाल निर्धारित कार्यों के लिए ही किया जा सकता है।
राज्य जैव विविधता बोर्ड इस फंड का उपयोग निम्नलिखित गतिविधियों में करेंगे:
- देसी फसलों और विलुप्त हो रही प्रजातियों का संरक्षण।
- पारंपरिक ज्ञान का दस्तावेजीकरण और लोक जैव विविधता रजिस्टर (PBR) का रख-रखाव।
- स्थानीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMC) का क्षमता निर्माण।
- पारिस्थितिकी तंत्र और कृषि अनुसंधान से जुड़ी परियोजनाओं का संचालन।
इसका असर: स्थानीय किसानों और कृषि व्यवस्था पर प्रभाव
जब बड़ी कृषि और बीज शोध कंपनियां भारत की पारंपरिक फसल किस्मों से नए उत्पाद बनाकर व्यावसायिक लाभ कमाती हैं, तो उस लाभ का एक हिस्सा सीधे पर्यावरण और कृषि संरक्षण के लिए लौटता है। इससे उन पारंपारिक बीजों को नया जीवन मिलता है जो आधुनिक व्यावसायिक खेती के कारण पीछे छूट रहे थे।
साथ ही, इस व्यवस्था से राज्यों की जैव विविधता परिषदों को वित्तीय स्थिरता मिलती है, जिससे वे पंचायत स्तर पर स्थानीय निकायों को जैव विविधता रजिस्टर और संरक्षण अभियान चलाने के लिए वित्तीय मदद दे पाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: जैविक विविधता फंड से उत्तर प्रदेश को कितनी राशि मिली है?
उत्तर: उत्तर प्रदेश को सबसे अधिक 10,35,790 रुपये का आवंटन मिला है।
प्रश्न: एबीएस (ABS) राशि का आवंटन किस आधार पर किया गया है?
उत्तर: कृषि मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल पर दर्ज फसलों के अनुमानित बोए गए क्षेत्रफल के अनुपात में फंड बांटा गया है।
प्रश्न: इस आवंटन के लिए किन निजी कंपनियों ने एबीएस योगदान दिया?
उत्तर: इसमें क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड, सवाना सीड्स प्राइवेट लिमिटेड और ननहेम्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड ने योगदान दिया है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






