
पीआईबी के अनुसार, भारत में माہی परوری का क्षेत्र अब बुनियादी उत्पादन से आगे बढ़कर तकनीक, मूल्यवर्धन और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला के जरिए देश की नीली अर्थव्यवस्था को नई ताकत दे रहा है।
मुख्य बातें
- वर्ष 2015 से सरकार ने नीली क्रांति और पीएमएमएसवाई जैसी योजनाओं के तहत कुल 39,272 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं।
- देशभर में 74.66 लाख माہی گیرों और मछली पालने वालों को रोजगार और आजीविका के अवसर मिल रहे हैं।
- परिवहन और रसद प्रणाली को मजबूत करने के लिए 3,393.85 करोड़ रुपये की लागत से 46,500 यूनिट जोड़े गए हैं।
- पिछले पांच वर्षों में 1.28 लाख से अधिक महिला लाभार्थियों के लिए 4,155 करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट मंजूर किए गए हैं।
भारत में माہی परوری का क्षेत्र अब पारंपरिक और केवल बुनियादी उत्पादन तक सीमित रहने वाली गतिविधि से आगे निकलकर एक आधुनिक, तकनीक पर आधारित और मूल्य संवर्धन को प्राथमिकता देने वाले मजबूत आर्थिक स्तंभ के रूप में उभर रहा है। पीआईबी (प्रेस सूचना ब्यूरो) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, यह बदलाव देश की नीली अर्थव्यवस्था को गति दे रहा है और ग्रामीण आजीविका को बेहतर बना रहा है।
माہی परوری क्षेत्र में हो रहे हैं कौन से बड़े बदलाव?
भारत में माہی परوری का क्षेत्र अब केवल मछली पकड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीक और मूल्यवर्धन का दौर शुरू हो चुका है। सरकार की विभिन्न योजनाओं और सार्वजनिक निवेश के कारण इस सेक्टर में कोल्ड स्टोरेज, परिवहन के बेहतर साधन और उन्नत प्रोसेसिंग यूनिट्स का तेजी से विस्तार हो रहा है।
पारंपरिक तौर-तरीकों की जगह अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ड्रोन तकनीक और ब्लॉकचेन जैसे आधुनिक साधनों का उपयोग किया जा रहा है। इससे न केवल कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी आ रही है, बल्कि मछली पालने वालों और माہی گیرों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की जा रही है।
सरकारी योजनाओं और निवेश का असर
वर्ष 2015 से केंद्र सरकार ने माہی परوری के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए भारी निवेश किया है। नीलंगों क्रांति योजना, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, प्रधानमंत्री मत्स्य समृद्धि सह योजना और किसान क्रेडिट कार्ड के माध्यम से कुल 39,272 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है। इन पहलों का मुख्य उद्देश्य देश के 74.66 लाख से अधिक माہی گیرों और मछली उत्पादकों के लिए आजीविका के नए रास्ते खोलना है।
- परिवहन और रसद नेटवर्क को बेहतर बनाने के लिए 3,393.85 करोड़ रुपये की लागत से 46,500 नए यूनिट्स जोड़े गए हैं।
- बाजार की मांग को पूरा करने के लिए पांच आधुनिक और स्मार्ट मछली मंडियां विकसित की जा रही हैं।
- मछली की उच्च गुणवत्ता वाली किस्मों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए जेनेटिक सुधार के कार्यक्रम शुरू किए गए हैं।
- किसानों की सामूहिक सौदेबाजी की ताकत बढ़ाने के लिए 2,195 मत्स्य कृषक उत्पादक संगठनों (FPOs) का गठन किया गया है।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और रोजगार के नए अवसर
माہی परوری के क्षेत्र में मूल्यवर्धन और प्रोसेसिंग से जुड़े कार्यों में महिलाओं की भूमिका बेहद अहम हो गई है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत पिछले पांच वर्षों में 1.28 लाख से अधिक महिलाओं को लाभान्वित करने के लिए 4,155 करोड़ रुपये से अधिक के प्रोजेक्ट्स को हरी झंडी दिखाई गई है। महिलाएं अब मछली सुखाने, आचार और पापड़ बनाने, पैकेजिंग और खुदरा बिक्री जैसे कामों से जुड़कर आत्मनिर्भर बन रही हैं।
यह भी जानें: माہی परوری और नीली अर्थव्यवस्था का भविष्य
पारंपरिक रूप से भारत में मछली पालन को एक असंगठित और स्थानीय स्तर का व्यवसाय माना जाता था, जहां किसानों को अपनी उपज का उचित मूल्य मिलने में कठिनाई होती थी। कोल्ड चेन और आधुनिक रसद की कमी के कारण एक बड़ा हिस्सा खराब हो जाता था। अब डिजिटल नेटवर्क्स और ओपन डिजिटल नेटवर्क फॉर कॉमर्स (ODNC) जैसी प्रणालियों से जुड़ने के कारण उत्पाद सीधे बड़े बाजारों और उपभोक्ताओं तक पहुंच रहे हैं, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम हो रही है और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? माہی परوری के विकास के लिए सरकार कौन सी प्रमुख योजनाएं चला रही है?
उत्तर। सरकार प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना, प्रधानमंत्री मत्स्य समृद्धि सह योजना, और मत्स्य पालन बुनियादी ढांचा विकास फंड (FIDF) जैसी योजनाएं संचालित कर रही है।
प्रश्न? इस क्षेत्र में महिलाओं के लिए क्या विशेष प्रयास किए जा रहे हैं?
उत्तर। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत महिलाओं को प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, और खुदरा व्यापार के लिए वित्तीय सहायता और प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






