
ICAR-CPRI ने विकसित कीं कुफरी जामुनिया जैसी बायोफोर्टिफाइड रंगीन किस्में, जानिए सामान्य आलू के मुकाबले इनमें कितना अधिक है पोषण।
मुख्य बातें
- ICAR-CPRI द्वारा विकसित कुफरी जामुनिया में सामान्य आलू की तुलना में दोगुना विटामिन सी और आठ गुना जिंक मौजूद है।
- 100 ग्राम कुफरी जामुनिया आलू में 42.75 मिलीग्राम विटामिन सी, 2.28 मिलीग्राम जिंक और 3.22 मिलीग्राम आयरन पाया जाता है।
- यह किस्म प्रति हेक्टेयर 32-35 टन औसत पैदावार देती है और उत्तर भारतीय मैदानी क्षेत्रों के लिए अनुशंसित है।
- इस बैंगनी आलू का उपयोग सब्जी, पराठे, हलवा के अलावा बेकरी उत्पाद और आलू का आटा बनाने में किया जा सकता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (ICAR-CPRI) द्वारा विकसित बैंगनी आलू देश में छिपी भूख यानी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को दूर करने में बड़ी सफलता बनकर उभरा है। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, देश की एक बड़ी आबादी पर्याप्त कैलोरी लेने के बावजूद आवश्यक विटामिन और खनिजों की कमी से जूझ रही है। इस सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने बायोफोर्टिफाइड यानी जैव-संवर्धित रंगीन आलू तैयार किए हैं। इनमें एंथोसायनिन, आयरन और जिंक जैसे जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व प्राकृतिक रूप से मौजूद हैं।
बैंगनी आलू क्या है और यह क्यों खास है?
बैंगनी आलू बायोफोर्टिफिकेशन तकनीक से विकसित एक विशेष किस्म है, जिसमें प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट और एंथोसायनिन पिगमेंट के कारण गूदे और छिलके का रंग बैंगनी होता है। इसमें सामान्य आलू की तुलना में लगभग दोगुना विटामिन सी, आठ गुना अधिक जिंक और पांच गुना से अधिक आयरन पाया जाता है, जो छिपी भूख दूर करने में मदद करता है।
बैंगनी आलू की प्रमुख विकसित किस्में
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान (ICAR-CPRI) ने पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से रंगीन आलू की कई किस्में तैयार की हैं। बायोफोर्टिफिकेशन के जरिए पोषक तत्वों को सीधे फसल के प्राकृतिक ढांचे में शामिल किया गया है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि खाद्य प्रसंस्करण के दौरान अलग से पोषक तत्व मिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
संस्थान द्वारा विकसित प्रमुख किस्मों का विवरण इस प्रकार है:
- कुफरी नीलकंठ: साल 2018 में जारी यह सीपीआरआई की पहली बैंगनी छिलके वाली विशेष आलू किस्म थी। यह किस्म पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाकों के लिए बहुत उपयुक्त पाई गई।
- कुफरी माणिक: इसे साल 2021 में जारी किया गया था। इस किस्म के आलू का छिलका गहरा लाल और अंदर का गूदा पीला होता है। इसमें एंथोसायनिन, जिंक और आयरन की मात्रा अधिक होती है।
- कुफरी जामुनिया: साल 2024 में आधिकारिक तौर पर जारी यह किस्म संस्थान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। इसका छिलका और अंदरूनी गूदा दोनों गहरा बैंगनी होता है। इसमें पुरानी किस्मों की तुलना में विटामिन सी, कैरोटीनॉयड और एंटीऑक्सीडेंट का स्तर बहुत अधिक दर्ज किया गया है।
कुफरी जामुनिया: पोषक तत्वों की सामान्य आलू से तुलना
बायोफोर्टिफाइड किस्म कुफरी जामुनिया पोषण के मामले में पारंपरिक सफेद या पीले आलू से काफी आगे है। संस्थान के आंकड़ों के अनुसार, इस किस्म के 100 ग्राम गूदे में 42.05 मिलीग्राम और छिलके में 80.66 मिलीग्राम एंथोसायनिन होता है। एंथोसायनिन शरीर को फ्री रेडिकल्स से बचाने में मदद करने वाला एक मजबूत एंटीऑक्सीडेंट है।
पोषक तत्वों का तुलनात्मक ब्योरा निम्नलिखित है:
- विटामिन सी: कुफरी जामुनिया में 42.75 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम है, जबकि सामान्य आलू में केवल 23.15 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम होता है।
- जिंक: इस किस्म में जिंक की मात्रा 2.28 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम है, जबकि सामान्य आलू में यह महज 0.28 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम पाई जाती है।
- आयरन: इसमें आयरन 3.22 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम मिलता है, जबकि साधारण आलू में यह केवल 0.57 मिलीग्राम प्रति 100 ग्राम ही होता है।
- कैरोटीनॉयड: इसके ताजे गूदे में लगभग 161 माइक्रोग्राम प्रति 100 ग्राम कैरोटीनॉयड पाया जाता है।
यह भी जानें: बैंगनी आलू की खेती और उपज क्षमता
किसानों के दृष्टिकोण से भी यह नई किस्म काफी लाभदायक सिद्ध हो रही है। उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में व्यापक खेती के लिए इसे अनुशंसित किया गया है। इसके पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं और फसल मध्यम अवधि में पककर तैयार हो जाती है।
कृषि अनुसंधान के परीक्षणों में पाया गया कि सामान्य अनुशंसित कृषि पद्धतियों का पालन करने पर इसकी पैदावार 32 से 35 टन प्रति हेक्टेयर रहती है। 90 दिनों की स्टेशन जांच अवधि के दौरान उसने प्रति हेक्टेयर 49 टन तक की अधिकतम उपज दर्ज की। कुल पैदावार में से लगभग 90 प्रतिशत आलू बाजार में बेचने योग्य गुणवत्ता के पाए गए।
भंडारण के मामले में इस किस्म की सुप्तावस्था (डोरमेंसी) 6 से 8 सप्ताह की होती है। इसके कारण आलू जल्दी अंकुरित नहीं होते। भंडारण के दौरान वजन में कम गिरावट आती है और सड़न की समस्या भी न्यूनतम रहती है, जिससे किसानों और व्यापारियों दोनों का नुकसान घटता है।
इसका असर: रसोई और खाद्य प्रसंस्करण में उपयोग
यह रंगीन किस्म केवल पोषण और पैदावार तक सीमित नहीं है, बल्कि रसोई में इसका स्वाद और दृश्य आकर्षण भी अनोखा है। भुरभुरी संरचना और सुखद स्वाद के कारण इसे रोजमर्रा के व्यंजनों के साथ-साथ प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों में आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके विविध उपयोगों में शामिल हैं:
- पारंपरिक व्यंजन: करी वाली सब्जी, पराठा, पूरी और रायता बनाने में इसका प्रयोग किया जा सकता है।
- नाश्ता और जलपान: हलवा, उपमा, दलिया, डोसा और इडली के घोल में इसका उपयोग किया जा रहा है।
- प्रसंस्कृत उत्पाद: इस आलू के आटे से बेकरी उत्पाद, सूप और कुकीज तैयार की जा सकती हैं।
- निर्जलित उत्पाद: सूजी, दलिया और विभिन्न आटे में इसका पाउडर मिलाकर पोषक तत्वों से भरपूर डिहाइड्रेटेड फूड बनाया जा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? बैंगनी आलू का रंग प्राकृतिक है या रासायनिक?
उत्तर। इसका बैंगनी रंग पूरी तरह से प्राकृतिक है, जो इसमें मौजूद एंथोसायनिन और कैरोटीनॉयड जैसे पिगमेंट के कारण होता है। इसमें किसी रासायनिक रंग का प्रयोग नहीं किया जाता।
प्रश्न? कुफरी जामुनिया किस्म की खेती किन राज्यों के लिए उपयुक्त है?
उत्तर। यह किस्म पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ सहित उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों की जलवायु और मिट्टी के लिए उपयुक्त है।
प्रश्न? सामान्य आलू की तुलना में इसमें क्या अलग है?
उत्तर। इसमें सामान्य आलू की तुलना में लगभग दोगुना विटामिन सी, आठ गुना ज्यादा जिंक और पांच गुना से अधिक आयरन पाया जाता है, जो पोषण सुरक्षा में मदद करता है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






