
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने पहुंच और लाभ साझाकरण व्यवस्था के तहत 29 राज्य जैव विविधता परिषदों और एक केंद्र शासित प्रदेश को 1.19 करोड़ रुपये वितरित किए हैं।
मुख्य बातें
- राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने 29 राज्य परिषदों और 1 केंद्र शासित प्रदेश को 1.19 करोड़ रुपये बांटे।
- यह राशि कंपनियों से प्राप्त एबीएस अंशदान के रूप में कृषि जैविक संसाधनों के लिए दी गई है।
- महाराष्ट्र को सबसे अधिक 19,46,149 रुपये और राजस्थान को 13,97,525 रुपये मिले।
- इस आवंटन में मक्का, चावल, बाजरा और कपास जैसी फसलें शामिल हैं।
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) ने देश भर के राज्यों में जैविक संसाधनों के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के अनुसार, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने पहुंच और लाभ साझाकरण (एबीएस) व्यवस्था के अंतर्गत 29 राज्य जैव विविधता परिषदों और एक केंद्र शासित प्रदेश जैव विविधता परिषद को कुल 1.19 करोड़ रुपये वितरित किए हैं। यह वित्तीय सहायता कृषि जैविक संसाधनों के अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग के एवज में विभिन्न कंपनियों से प्राप्त अंशदान के जरिए जुटाई गई है।
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) एक ऐसा वैधानिक निकाय है जो देश के जैविक संसाधनों के संरक्षण, उनके सतत उपयोग और संसाधनों के व्यावसायिक इस्तेमाल से मिलने वाले लाभों को स्थानीय समुदायों के साथ न्यायसंगत तरीके से साझा करने का काम करता है। भारत में जैव विविधता अधिनियम, 2002 के प्रावधानों को लागू करने के लिए एनबीए की स्थापना की गई थी। यह प्राधिकरण यह सुनिश्चित करता है कि जब भी कोई कंपनी या शोध संस्थान देश के जैविक संसाधनों का उपयोग करे, तो उसका उचित लाभ उन लोगों तक भी पहुंचे जो पीढ़ियों से इन संसाधनों का संरक्षण करते आए हैं।
चूंकि जैविक संसाधन आमतौर पर बाजारों या व्यापारियों के माध्यम से प्राप्त किए जाते हैं, इसलिए व्यक्तिगत मूल लाभार्थियों की सीधी पहचान करना हमेशा संभव नहीं होता है। इस समस्या से निपटने के लिए, राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने एक विशेष विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों और प्राधिकरण के अनुमोदन के आधार पर एक सुव्यवस्थित वितरण प्रणाली अपनाई है। यह आवंटन कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के एकीकृत कृषि सांख्यिकी पोर्टल पर प्रकाशित आधिकारिक कृषि आंकड़ों के अनुपात में तय किया गया है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
किन राज्यों को कितनी राशि मिली?
इस ताजा वितरण प्रक्रिया के तहत देश के विभिन्न राज्यों को उनकी कृषि विविधता और हिस्सेदारी के अनुसार धनराशि भेजी गई है। शीर्ष दस राज्यों में महाराष्ट्र को सबसे अधिक वित्तीय मदद मिली है।
- महाराष्ट्र: 19,46,149.00 रुपये
- राजस्थान: 13,97,525.00 रुपये
- मध्य प्रदेश: 13,32,250.00 रुपये
- कर्नाटक: 10,49,957.00 रुपये
- तेलंगाना: 9,55,754.00 रुपये
- गुजरात: 8,84,783.00 रुपये
- उत्तर प्रदेश: 8,26,607.00 रुपये
- बिहार: 4,82,143.00 रुपये
- आंध्र प्रदेश: 4,27,541.00 रुपये
- पश्चिम बंगाल: 3,72,103.00 रुपये
इन दस राज्यों के अलावा अन्य सभी बचे हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के बीच कुल 21,86,843.00 रुपये बांटे गए हैं, जिससे कुल वितरित राशि 1,18,61,655 रुपये यानी लगभग 1.19 करोड़ रुपये हो जाती है।
किन कंपनियों और फसलों से जुड़ा है यह अंशदान?
इस आवंटन में मुख्य रूप से कृषि संबंधी जैविक संसाधन शामिल हैं, जिनमें मक्का (ज़िया मेज़ एल.), चावल (ओरिज़ा सैटिवा एल.), बाजरा (पेनिसेटम ग्लौकम) और कपास (गॉसिपियम हिर्सुटम) जैसी फसलें शामिल हैं। इन फसलों की विभिन्न किस्मों और संकरों के अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग के लिए कई बड़ी कंपनियों ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को अपना अंशदान दिया है।
पायनियर ओवरसीज कॉर्पोरेशन, कोर्टेवा क्रॉप इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, लिमाग्रेन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, सिंजेंटा इंडिया लिमिटेड और क्रिस्टल क्रॉप प्रोटेक्शन लिमिटेड जैसी प्रमुख कंपनियों से यह योगदान प्राप्त हुआ है। इन कंपनियों ने मक्का, चावल, बाजरा और कपास की विभिन्न किस्मों पर किए गए शोध और उनके व्यावसायिक उत्पादन के लिए यह राशि जमा की है, जिसे अब राज्य परिषदों को भेजा गया है.
पैसा कहां और कैसे खर्च किया जाएगा?
राज्य जैव विविधता परिषदों और केंद्र शासित प्रदेश परिषद को मिलने वाली इस धनराशि का उपयोग किसी भी सामान्य काम के लिए नहीं किया जा सकता है। जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 32(2) के अंतर्गत इस राशि को खर्च करने के कड़े नियम तय किए गए हैं। इस फंड का इस्तेमाल विशेष रूप से स्थानीय जैव विविधता का विस्तृत दस्तावेजीकरण तैयार करने, उसके संरक्षण और सतत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए किया जाएगा।
इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर जैव विविधता शासन को मजबूत करने, वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देने, क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का आयोजन करने और ग्रामीण समुदायों की आजीविका में सुधार लाने के लिए इस पैसे का उपयोग किया जाना है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने अब तक कृषि क्षेत्र से प्राप्त कुल 86 करोड़ रुपये विभिन्न लाभार्थियों के बीच वितरित किए हैं, जबकि कुल मिलाकर प्राधिकरण 203 करोड़ रुपये से अधिक की राशि अलग-अलग माध्यमों से बांट चुका है.
अंतरराष्ट्रीय मंच और आगे की तैयारियां
भारत एक तरफ जहां देश के भीतर जैविक विरासत को संरक्षित करने में जुटा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी प्रतिबद्धता लगातार दिख रही है। आगामी 19 से 30 अक्टूबर 2026 के दौरान आर्मेनिया के येरेवन में जैविक विविधता सम्मेलन (सीओपी 17) का सत्रहवां सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। भारत इस वैश्विक सम्मेलन की तैयारी कर रहा है और ऐसे में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के ये प्रयास देश की उस प्रतिबद्धता को मजबूती से रेखांकित करते हैं जिसके तहत प्राकृतिक संसाधनों के व्यावसायिक इस्तेमाल का लाभ सीधे स्थानीय समुदायों तक पहुंचाया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण द्वारा वितरित राशि का मुख्य स्रोत क्या है?
उत्तर। यह राशि कंपनियों द्वारा कृषि जैविक संसाधनों के अनुसंधान और व्यावसायिक उपयोग के लिए दिए गए पहुंच और लाभ साझाकरण (एबीएस) अंशदान से प्राप्त हुई है।
प्रश्न? इस फंड का उपयोग किस कानून के तहत किया जाता है?
उत्तर। इस धनराशि का उपयोग जैव विविधता अधिनियम, 2002 की धारा 32(2) के अंतर्गत निर्दिष्ट गतिविधियों के लिए किया जाता है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






