
नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने पांचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में कहा कि भारत के तेज आर्थिक विकास के लिए कम दखल वाले और जोखिम के आधार पर तय किए गए नियमन ढांचे की जरूरत है।
मुख्य बातें
- राजीव गौबा ने 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के दौरान अपने विचार रखे।
- उन्होंने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में तेजी से हो रहे बदलावों का जिक्र किया।
- उन्होंने ‘ज्यादा जोखिम वाली जगहों पर सख्त और कम जोखिम वाली जगहों पर कम दखल’ वाला नियम अपनाने की बात कही।
- यह पहल 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य और प्रधानमंत्री मोदी के ‘जन विश्वास’ दृष्टिकोण के अनुरूप है।
नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने 5वें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में “बदलाव के दौर में नियमन निगरानी” विषय पर आयोजित सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि तेजी से बदलते भू-राजनीतिक और आर्थिक माहौल के साथ नियमन ढांचे का विकास होना बहुत जरूरी है। पत्र सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, उन्होंने नीति-निर्माताओं से ऐसे नियम तैयार करने का आह्वान किया है जो जोखिमों को नियंत्रित करने के साथ-साथ देश में नवाचार, प्रतिस्पर्धा और नए निवेश को बढ़ावा दें।
कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में विकास और नियमन पर चर्चा
कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव में अपने संबोधन के दौरान राजीव गौबा ने स्पष्ट किया कि आधुनिक बिज़नेस मॉडल अब कई क्षेत्रों और तकनीकों में फैल चुके हैं, जिससे उनकी जटिलता लगातार बढ़ रही है। पारंपरिक सीमाएं कम होने के कारण नियमन ढांचों को इस तरह विकसित होना चाहिए कि वे बिना किसी विरोधाभासी बाध्यता के आपस में जुड़े जोखिमों से प्रभावी ढंग से निपट सकें। उन्होंने रेखांकित किया कि भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में रुकावटें और टैरिफ जैसे रणनीतिक साधन वैश्विक आर्थिक परिदृश्य को तेजी से बदल रहे हैं।
कम दखल और जोखिम के अनुसार नियमन की जरूरत
राजीव गौबा ने इस बात पर जोर दिया कि सुरक्षा और बाजार की स्थिरता के लिए नियमन आवश्यक हैं, लेकिन अत्यधिक या जटिल नियम नवाचार और निवेश में बाधा बन सकते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि देश की प्रतिस्पर्धात्मकता केवल बुनियादी ढांचे या श्रम कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्पष्ट और पूर्वानुमान लगाने योग्य नियमन माहौल पर भी निर्भर करती है।
- नियामक जरूरतें शामिल जोखिमों की प्रकृति और नतीजों के आधार पर तय की जानी चाहिए।
- तेजी से बदलते क्षेत्रों में नियामकों को हर संभावित विफलता के लिए समाधान बताने से बचना चाहिए।
- नियामक स्वतंत्रता के साथ-साथ जवाबदेही और पारदर्शिता का होना भी उतना ही अनिवार्य है।
- बाजार और प्रौद्योगिकी के परिष्कृत होने के साथ ही नियामकों के लिए विशेषज्ञता बढ़ाना जरूरी है।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य की ओर कदम
कॉन्क्लेव में आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि लक्ष्य एक ऐसी व्यवस्था का होना चाहिए जो ज्यादा जोखिम वाली जगहों पर सख्त हो और कम जोखिम वाली जगहों पर कम दखल देने वाली हो। इसे भारत की विकास यात्रा से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने और तेज विकास दर बनाए रखने के लिए लाइट-टच रेगुलेशन की ओर निर्णायक बदलाव जरूरी है। यह दृष्टिकोण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भरोसे पर आधारित शासन और ‘जन विश्वास’ की सोच के पूरी तरह अनुरूप है।
इसका असर और नियामक क्षमता निर्माण
बदलते समय के साथ नियामकों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया ताकि काम के दोहराव से बचा जा सके। नीति आयोग के सदस्य ने कहा कि विश्लेषणात्मक क्षमताओं को मजबूत करने, विशेषज्ञ प्रतिभाओं को आकर्षित करने और उद्योग जगत के साथ संरचित जुड़ाव विकसित करने से नियामक क्षमता में सुधार होगा। इससे नए निवेशकों को स्पष्टता मिलेगी और देश के समग्र आर्थिक विकास को गति प्राप्त होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? 5वां कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव कहाँ और किसके द्वारा संबोधित किया गया? उत्तर। इस कॉन्क्लेव में नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने “बदलाव के दौर में नियमन निगरानी” सत्र को संबोधित किया।
प्रश्न? राजीव गौबा ने किस तरह के नियमन अपनाने की वकालत की है? उत्तर। उन्होंने कम दखल वाले, पारदर्शी और जोखिम के आधार पर तय किए जाने वाले लाइट-टच रेगुलेशन को अपनाने का आह्वान किया है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






