
सीएसआईआर-सीआरआरआई और जियोसिंथेटिक्स सोसायटी द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में विशेषज्ञ बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की तकनीकों पर चर्चा कर रहे हैं।
मुख्य बातें
- नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-सीआरआरआई में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ।
- राजमार्गों और रेलवे पटरियों के स्थिरीकरण व क्षति निवारण के लिए आधुनिक भू-संश्लेषणात्मक तकनीकों पर मंथन।
- रेलवे बोर्ड, एनएचआईडीसीएल, आईआईटी बॉम्बे और सीआरआरआई के शीर्ष विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया।
- हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में ढलान सुरक्षा तथा रॉकफॉल सुरक्षा प्रणालियों पर विशेष ध्यान दिया गया।
नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई) सभागार में जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी का दो दिवसीय आयोजन आधिकारिक रूप से शुरू हो गया है। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन सीएसआईआर-सीआरआरआई और पुणे स्थित जियोसिंथेटिक्स सोसायटी (जीएस) द्वारा संयुक्त रूप से किया जा रहा है। इस सम्मेलन का प्राथमिक उद्देश्य देश के राजमार्गों और रेलवे नेटवर्क में संरचनात्मक प्रदर्शन सुधारने तथा क्षति निवारण के लिए आधुनिक भू-संश्लेषणात्मक तकनीकों को बढ़ावा देना है। इस कार्यक्रम में देश भर से प्रमुख नीति निर्माता, बुनियादी ढांचा प्राधिकरण, भू-तकनीकी विशेषज्ञ और उद्योग जगत के प्रतिनिधि एक साथ मंच पर एकत्र हुए हैं।
जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य क्या है?
जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य भारत के राजमार्गों और उच्च गति रेल नेटवर्क के लिए आधुनिक जियोसिंथेटिक समाधानों को मानकीकृत करना और अपनाना है। यह संगोष्ठी सड़क और रेल बुनियादी ढांचे की मजबूती, ढलान स्थिरीकरण और भू-तकनीकी चुनौतियों से निपटने के लिए एक एकीकृत राष्ट्रीय रणनीति तैयार करने में मदद करती है।
भारत सरकार के परिवहन और रेलवे बुनियादी ढांचे में जियोसिंथेटिक्स का इस्तेमाल अब एक बेहद जरूरी हिस्सा बन चुका है। पहाड़ी और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में जहां भूस्खलन और मिट्टी धंसने जैसी समस्याएं आम हैं, वहां जियोग्रिड, जियोटेक्सटाइल और बहुलक सामग्रियां बुनियादी ढांचे को लंबी उम्र प्रदान करती हैं। सीएसआईआर-सीआरआरआई सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि देश के दूरदराज के क्षेत्रों और रणनीतिक गलियारों में मजबूत परिवहन संपर्क स्थापित करने के लिए उन्नत सामग्रियों का मानकीकरण आवश्यक है।
जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी में रेलवे और राजमार्गों पर चर्चा
इस जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी में उद्घाटन सत्र की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्ज्वलन और राष्ट्रगान के साथ हुई। जियोसिंथेटिक्स सोसायटी की उपाध्यक्ष सुश्री मिनिमोल कोरूला ने कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए संगोष्ठी की रूपरेखा रखी। उन्होंने कहा कि संरचनात्मक स्थायित्व को बेहतर बनाने के लिए निर्माण क्षेत्र में नई बहुलक सामग्रियों और मानकीकृत प्रक्रियाओं को लागू करने की आवश्यकता है।
सीएसआईआर-सीआरआरआई के निदेशक डॉ. चालुमुरी रवि शेखर ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि जियोसिंथेटिक्स अब केवल कोई वैकल्पिक निर्माण सामग्री नहीं रह गए हैं। वे भारत के आधुनिक अवसंरचना विकास में टिकाऊ और उच्च क्षमता वाले गलियारों के निर्माण की मूल आवश्यकता बन चुके हैं। उनके अनुसार परिवहन क्षेत्र में अनुसंधान और व्यावहारिक अनुप्रयोगों के बीच तालमेल बैठाना समय की मांग है।
भारतीय भू-तकनीकी सोसायटी (आईजीएस) के अध्यक्ष और सीएसआईआर-सीआरआरआई अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष प्रोफेसर जी.एल. शिवकुमार बाबू ने इस अवसर पर कहा कि पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ इंजीनियरिंग के साथ जियोसिंथेटिक्स को जोड़ना रणनीतिक रूप से जरूरी है। वहीं, इस जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी में रेलवे बोर्ड के कार्यकारी निदेशक श्री विवेक भूषण सूद ने भारतीय रेलवे के आधुनिकीकरण पर बात की। उन्होंने बताया कि पटरियों के स्थिरीकरण, भारी माल ढुलाई की क्षमता बढ़ाने और कंपन कम करने में जियोसिंथेटिक्स प्रणाली बहुत सहायक सिद्ध हो रही है।
राष्ट्रीय राजमार्ग एवं अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड (एनएचआईडीसीएल) के निदेशक श्री अमरेंद्र कुमार ने पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों में उच्च ऊंचाई वाली सड़क परियोजनाओं में आ रही चुनौतियों और उनके भू-संश्लेषणात्मक समाधानों का विस्तृत ब्योरा दिया। सत्र का समापन सीएसआईआर-सीआरआरआई के डॉ. के. रविंदर द्वारा दिए गए धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ।
तकनीकी सत्र और मुख्य चर्चा बिंदु
इस जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर और अन्य शोधकर्ताओं ने राजमार्ग व रेलवे बुनियादी ढांचे की परिचालन संबंधी चुनौतियों पर कई विचार रखे। पहले दिन आयोजित तकनीकी सत्रों में उद्योग विशेषज्ञों और शिक्षाविदों ने वास्तविक निर्माण अनुभव साझा किए। इस दौरान जिन प्रमुख विषयों पर ध्यान केंद्रित किया गया, वे इस प्रकार हैं:
- प्रबलित मृदा (आरएस) दीवारों में क्षति निवारण: आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर आशीष जुनेजा के संचालन में एनएचएआई (श्री एल.एम. पाधी), सड़क परिवहन मंत्रालय (श्री बिदुर कांत झा), आईआईटी तिरुपति (प्रोफेसर मुरली कृष्णा) और सीआरआरआई (डॉ. कंवर सिंह) के विशेषज्ञों ने रिटेनिंग दीवारों के नैदानिक मूल्यांकन और मरम्मत पद्धतियों पर गहन चर्चा की।
- केस स्टडीज और क्षेत्रीय अंतर्दृष्टि: आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर बीवीएस विश्वनाधम, सीआरआरआई के डॉ. पी एस प्रसाद, बी एंड एस इंजीनियरिंग के डॉ. आलोक भौमिक और सुश्री अतासी दास ने जियोग्रिड-प्रबलित संरचनाओं के वास्तविक उदाहरण प्रस्तुत किए।
- रेल अवसंरचना में नवाचार: आईआईटी गांधीनगर के श्री विवेक कपाडिया की अध्यक्षता वाले सत्रों में प्रोफेसर अमित प्रशांत और सीआरआरआई के डॉ. नसीम अख्तर ने उच्च गति रेल प्रणालियों और क्लोज्ड-सेल पॉलीमरिक फोम द्वारा कंपन अलगाव तकनीकों पर विचार रखे।
- फुटपाथ स्थिरीकरण और डामर ओवरले: जियोग्रिड-प्रबलित डामर और प्लास्टिक जियोसेल के माध्यम से हरित फुटपाथ निर्माण तकनीकों पर चर्चा हुई।
- रॉकफॉल सुरक्षा प्रणाली: हिमालयी ढलानों पर चट्टान गिरने से बचाव और ढलान तटबंधों के संरक्षण हेतु नवीन भू-समाधान प्रस्तुत किए गए।
राजमार्ग और रेल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जियोसिंथेटिक्स तकनीक का महत्व
भारत में अवसंरचना निर्माण का कार्य अभूतपूर्व गति से चल रहा है। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार हो या हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर का निर्माण, दोनों ही क्षेत्रों में भू-तकनीकी चुनौतियां प्रमुख बाधा बनती हैं। ऐसे में जियोसिंथेटिक्स सामग्रियां मिट्टी की असरदार भार-वहन क्षमता बढ़ाती हैं और निर्माण लागत में कमी लाती हैं। जब जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी जैसे मंचों पर नीति निर्माता और इंजीनियर एक साथ आते हैं, तो तकनीकी मानकों में सुधार का मार्ग प्रशस्त होता है।
पहाड़ी गलियारों में भूस्खलन और ढलान की अस्थिरता को रोकने के लिए जियोग्रिड और जियोसेल का उपयोग बहुत प्रभावी साबित हुआ है। यह तकनीक न केवल सड़कों को टूटने से बचाती है बल्कि मरम्मत और रखरखाव पर होने वाले भारी खर्च को भी कम करती है। रेलवे नेटवर्क में, पटरी के नीचे गिट्टी को स्थिर रखने और ट्रेनों के कंपन को अवशोषित करने में जियोसिंथेटिक लेयर्स का बड़ा योगदान है। मैकाफेरी, टेकफैब इंडिया, स्ट्रेटा जियोसिस्टम्स और जियोक्वेस्ट इंडिया जैसी कंपनियों ने भी इस दिशा में अपनी नवीनतम तकनीकें प्रदर्शित की हैं।
संगोष्ठी के दूसरे दिन के मुख्य आकर्षण और भावी कार्ययोजना
इस जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन सतत फुटपाथ स्थिरीकरण और भूमिगत जल निकासी समाधानों पर केंद्रित तकनीकी सत्रों का आयोजन किया गया। इसमें जियोसिंथेटिक्स इंस्टीट्यूट (जीएसआई) के अध्यक्ष का विशेष व्याख्यान शामिल रहा, जिन्होंने परिवहन अवसंरचना में जियोसिंथेटिक्स के जीवनचक्र और लचीले प्रदर्शन पर रोशनी डाली।
इसके अलावा, दूसरे दिन आईआईटी जोधपुर और एलएएसए के विशेषज्ञों द्वारा पहाड़ी ढलानों की सुरक्षा और चट्टान गिरने से बचाव करने वाली प्रणालियों पर केस स्टडी प्रस्तुत की गई। संगोष्ठी का अंतिम चरण एक उच्चस्तरीय पैनल चर्चा के साथ समाप्त हुआ, जिसमें देश में जियोसिंथेटिक्स तकनीक को व्यापक स्तर पर लागू करने के लिए राष्ट्रीय कार्ययोजना की रूपरेखा तैयार की गई।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? जियोसिंथेटिक्स राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन कहां किया जा रहा है?
उत्तर। इस दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन नई दिल्ली स्थित सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई) के सभागार में किया जा रहा है।
प्रश्न? जियोसिंथेटिक्स तकनीक का उपयोग किस क्षेत्र में किया जाता है?
उत्तर। जियोसिंथेटिक्स का उपयोग राष्ट्रीय राजमार्गों, रेलवे पटरियों, उच्च गति रेल गलियारों और पहाड़ी क्षेत्रों में ढलान स्थिरीकरण व क्षति निवारण के लिए किया जाता है।
प्रश्न? इस राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किन संस्थाओं द्वारा किया गया है?
उत्तर। इस संगोष्ठी का आयोजन सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीआरआरआई) और पुणे स्थित जियोसिंथेटिक्स सोसायटी (जीएस) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है।
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