
भारतीय वैज्ञानिकों ने टाइटेनियम और ज़िरकोनिया को मिलाकर सिंगल-पीस डेंटल इम्प्लांत तैयार किया है, जिससे इलाज की लागत और सर्जरी की जटिलता घटेगी।
मुख्य बातें
- ARCI के वैज्ञानिकों ने टाइटेनियम (Ti6Al4V) और ज़िरकोनिया (YSZ) को मिलाकर दो-स्तरीय डेंटल इम्प्लांत विकसित किया।
- स्पार्क प्लाज्मा सिंटरिंग (SPS) तकनीक से 99.5 प्रतिशत तक सामग्री घनत्व प्राप्त किया गया।
- यांत्रिक परीक्षण में 1350 HV कठोरता, 1550 MPa संपीडन शक्ति और 310 MPa फ्लेक्सुरल शक्ति पाई गई।
- MTT परीक्षण में 90 प्रतिशत से अधिक कोशिकीय चयापचय गतिविधि दर्ज की गई, जो पूरी तरह सुरक्षित है।
- नई तकनीक से बार-बार होने वाली सर्जरी की आवश्यकता खत्म होगी और इम्प्लांट ढीला होने का जोखिम घटेगा।
डेंटल इम्प्लांत कराने वाले मरीजों के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान, इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मैटेरियल्स (ARCI) के वैज्ञानिकों ने दो परतों वाली एक विशेष संरचना तैयार की है। पीआईबी के अनुसार, यह तकनीक डेंटल इम्प्लांत की शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं को सरल बनाने के साथ-साथ दांतों के प्रत्यारोपण को अधिक टिकाऊ और सुरक्षित बनाती है।
डेंटल इम्प्लांत की नई तकनीक से क्या बदलाव आएगा?
डेंटल इम्प्लांट की यह दो-स्तरीय तकनीक एआरसीआई के वैज्ञानिकों द्वारा विकसित की गई है, जो टाइटेनियम मिश्र धातु और ज़िरकोनिया को एक साथ जोड़ती है। यह नया डेंटल इम्प्लांट बार-बार होने वाली सर्जरी की आवश्यकता को कम करता है और जबड़े की हड्डी में बेहतर मजबूती तथा प्राकृतिक सुंदरता प्रदान करता है।
इस नवाचार का मुख्य उद्देश्य पारंपरिक प्रत्यारोपण में आने वाली यांत्रिक और जैविक समस्याओं को दूर करना है। वैज्ञानिकों ने टाइटेनियम मिश्र धातु (Ti6Al4V) और यट्रिया-स्थिर ज़िरकोनिया (YSZ) को एक ही एकीकृत सिंगल-पीस संरचना में समेकित किया है। इससे मरीज को बार-बार अस्पताल के चक्कर काटने और कई दौर की सर्जरी से मुक्ति मिलेगी।
पारंपरिक डेंटल इम्प्लांत की सीमाएं और नई तकनीक की जरूरत
सामान्य तौर पर इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक डेंटल इम्प्लांत में मुख्य रूप से तीन अलग-अलग घटक होते हैं। इनमें पहला जबड़े की हड्डी में लगाया जाने वाला फिक्स्चर, दूसरा फिक्स्चर और क्राउन को जोड़ने वाला एबटमेंट और तीसरा स्वयं क्राउन शामिल होता है। इन बहु-घटक संरचनाओं में सबसे बड़ी समस्या एबटमेंट इंटरफ़ेस पर होने वाली सूक्ष्म हलचल होती है। इस हलचल के कारण जबड़े की हड्डी के साथ इम्प्लांट का एकीकरण प्रभावित होता है और समय के साथ इम्प्लांट ढीला पड़ जाता है।
इसके अतिरिक्त, पारंपरिक डेंटल इम्प्लांट लगाने के लिए डॉक्टर को आमतौर पर दो से तीन सर्जिकल प्रक्रियाएं करनी पड़ती हैं। इससे मरीज को लंबे समय तक असुविधा झेलनी पड़ती है और नैदानिक जटिलता भी बढ़ जाती है। यद्यपि टाइटेनियम मिश्र धातु और ज़िरकोनिया का उपयोग जैव अनुकूलता और मजबूती के कारण लंबे समय से हो रहा है, लेकिन अलग-अलग उपयोग किए जाने पर दोनों सामग्रियों की अपनी सीमाएं हैं।
उदाहरण के लिए, टाइटेनियम मिश्र धातु मुंह के नम वातावरण में संक्षारण और मसूड़ों के सिकुड़ने के प्रति संवेदनशील हो सकती है। दूसरी ओर, ज़िरकोनिया दिखने में बेहद आकर्षक और संक्षारण प्रतिरोधी होता है, लेकिन लार और नमी के संपर्क में आने से जल अपघटन के कारण समय के साथ इसका अवक्रमण हो सकता है। एआरसीआई के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित यह नया द्विस्तरीय डेंटल इम्प्लांट इन दोनों सामग्रियों के लाभों को जोड़कर इन सीमाओं को समाप्त करता है।
स्पार्क प्लाज्मा सिंटरिंग तकनीक से हुआ निर्माण
एआरसीआई के शोधकर्ताओं ने इस जटिल संरचना के निर्माण के लिए स्पार्क प्लाज्मा सिंटरिंग (SPS) नामक उन्नत पाउडर धातुकर्म तकनीक का उपयोग किया है। सिंटरिंग प्रक्रिया के दौरान तापमान को सटीक रूप से नियंत्रित करने के लिए एक विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए टेपर्ड ग्रेफाइट डाई का उपयोग किया गया। टाइटेनियम मिश्र धातु और ज़िरकोनिया के सिंटरिंग तापमान में काफी अंतर होता है, लेकिन इस नई विधि ने दोनों को एक साथ सघन बनाने में सफलता हासिल की।
इस निर्माण प्रक्रिया से सामग्री का घनत्व 99.5 प्रतिशत तक पहुंच गया, जिससे बिना किसी दोष के एक मजबूत दो-स्तरीय डेंटल इम्प्लांट तैयार हुआ। इसके बाद थ्रेडेड इम्प्लांट का सटीक आकार देने के लिए 5-एक्सिस सीएनसी मशीन द्वारा मशीनिंग परीक्षण किए गए। हालांकि घुमावदार सतहों पर टूल की गति से जुड़ी कुछ चुनौतियां देखी गईं, जिन पर प्रक्रिया अनुकूलन का काम जारी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह समग्र निर्माण विधि अत्यधिक पुनरुत्पादकता योग्य है और औद्योगिक पैमाने पर उत्पादन के लिए पूरी तरह उपयुक्त है।
यांत्रिक क्षमता और परीक्षण के मुख्य आंकड़े
प्रयोगशाला में किए गए परीक्षणों से पुष्टि हुई है कि इस नए इम्प्लांट में दरारों, छिद्रों या परतदारपन के बिना एक सुव्यवस्थित इंटरफ़ेस तैयार होता है। इस आधुनिक डेंटल इम्प्लांट के प्रमुख तकनीकी और यांत्रिक मापदंड निम्नलिखित हैं:
- सामग्री घनत्व: सिंटरिंग प्रक्रिया के माध्यम से 99.5 प्रतिशत तक उच्च घनत्व प्राप्त किया गया।
- कठोरता: परीक्षण के दौरान इस द्विस्तरीय संरचना की कठोरता 1350 HV तक दर्ज की गई।
- संपीडन शक्ति: इम्प्लांट की संपीडन शक्ति लगभग 1550 MPa पाई गई, जो अत्यधिक दबाव सहने में सक्षम है।
- फ्लेक्सुरल शक्ति: इसकी फ्लेक्सुरल शक्ति लगभग 310 MPa रही, जो व्यावसायिक प्रत्यारोपण सामग्रियों से बेहतर है।
- जैविक सुरक्षा: L929 माउस फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाओं पर किए गए MTT परीक्षण में 90 प्रतिशत से अधिक कोशिकीय चयापचय गतिविधि पाई गई।
डेंटल इम्प्लांट के जैविक परीक्षण और सुरक्षा मूल्यांकन
किसी भी बायोमेडिकल उपकरण के लिए जैविक सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण कारक होती है। एआरसीआई द्वारा विकसित डेंटल इम्प्लांट का गहन प्रयोगशाला परीक्षण किया गया, जिसमें इसके गैर-साइटोटॉक्सिक व्यवहार और उत्कृष्ट जैव अनुकूलता की पुष्टि हुई। हीमोलिसिस परीक्षणों में पाया गया कि यह संरचना लाल रक्त कोशिकाओं को नगण्य नुकसान पहुंचाती है, जिससे यह मानव शरीर और मुंह के वातावरण के लिए पूरी तरह सुरक्षित सिद्ध होती है।
इस इम्प्लांट में टाइटेनियम भाग हड्डी के साथ मजबूत जुड़ाव सुनिश्चित करता है, जबकि ज़िरकोनिया भाग ऊपरी क्राउन के रूप में घिसाव प्रतिरोध और प्राकृतिक दांत जैसी सुंदरता प्रदान करता है। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका मैटेरियल्स लेटर्स में भी प्रकाशित हो चुका है। भारत में किफायती और उच्च गुणवत्ता वाले बायोमेडिकल उपकरणों की मांग को पूरा करने की दिशा में यह एक बड़ी उपलब्धि है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? नया डेंटल इम्प्लांट पारंपरिक इम्प्लांट से किस प्रकार अलग है?
उत्तर। पारंपरिक इम्प्लांट में तीन अलग-अलग हिस्से होते हैं जिनमें ढीला होने का जोखिम रहता है, जबकि यह नया डेंटल इम्प्लांट दो परतों वाली एक एकीकृत सिंगल-पीस संरचना है जो अधिक मजबूत और टिकाऊ है।
प्रश्न? इस नए डेंटल इम्प्लांट से मरीजों को क्या मुख्य लाभ होगा?
उत्तर। इससे मरीजों को बार-बार सर्जरी कराने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी, इलाज का समय घटेगा, मसूड़ों में संक्रमण का खतरा कम होगा और दांतों को प्राकृतिक रूप व मजबूती मिलेगी।
प्रश्न? इस दो-स्तरीय तकनीक को किस संस्थान ने विकसित किया है?
उत्तर। इस तकनीक को भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के अंतर्गत कार्यरत इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मैटेरियल्स (ARCI) के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






