शुक्रवार, सितम्बर 4, 2026

जलियांवाला बाग हत्याकांड: 13 अप्रैल 1919 को क्या हुआ था?

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जलियांवाला बाग

13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर के जलियांवाला बाग में ब्रिटिश सरकार ने निहत्थे भारतीयों पर अंधाधुंध गोलियां चलाई थीं। जानिए इस घटना का पूरा घटनाक्रम और इसके ऐतिहासिक परिणाम।

मुख्य बातें

  • 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर में जनरल डायर ने निहत्थे लोगों पर गोलीबारी कराई।
  • रोलट एक्ट और लोकप्रिय नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में बुलाई गई थी शांतिपूर्ण सभा।
  • घटना के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी ‘नाइटहुड’ उपाधि वापस कर दी थी।
  • सरकारी आंकड़ों में 379 मौतें दर्ज हुईं, जबकि कांग्रेस के अनुसार 1,000 से अधिक लोग शहीद हुए थे।

जलियांवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर में हुआ भारतीय इतिहास का सबसे बर्बर और दुखद नरसंहार था। ब्रिटिश सेना के ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर ने एक बंद मैदान में एकत्रित निहत्थे पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर बिना किसी पूर्व चेतावनी के अंधाधुंध गोलियां चलवा दी थीं।

जलियांवाला बाग हत्याकांड क्या था?

जलियांवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर में हुआ एक भीषण नरसंहार था। अंग्रेजों के कड़े रोलेट एक्ट का विरोध करने और अपने नेताओं की रिहाई की मांग के लिए इस मैदान में शांतिपूर्ण सभा आयोजित की गई थी। ब्रिटिश अधिकारी जनरल डायर ने बिना चेतावनी निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलवा दी थीं।

रोलट एक्ट और जलियांवाला बाग की पृष्ठभूमि

ब्रिटिश सरकार ने मार्च 1919 में रोलेट एक्ट (Rowlatt Act) पारित किया था। इस दमनकारी कानून के तहत पुलिस किसी भी भारतीय को बिना कोई मुकदमा चलाए और बिना जमानत के दो साल तक जेल में बंद रख सकती थी। पूरे देश में इसे ‘काला कानून’ कहा गया और पंजाब में इसका तीव्र विरोध हुआ।

अमृतसर में विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व दो लोकप्रिय नेता—डॉक्टर सत्यपाल और डॉक्टर सैफुद्दीन किचलू कर रहे थे। 9 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश प्रशासन ने इन दोनों नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इस गिरफ्तारी से जनता में आक्रोश फैल गया और शहर में तनाव बढ़ गया। इसके बाद प्रशासन ने अमृतसर में कर्फ्यू लगा दिया और शहर की सुरक्षा का जिम्मा ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर को सौंप दिया।

13 अप्रैल 1919: जलियांवाला बाग में उस दिन क्या हुआ?

13 अप्रैल को बैसाखी का पावन पर्व था। पंजाब भर से ग्रामीण और श्रद्धालु हरिमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) में दर्शन करने और उत्सव मनाने अमृतसर पहुंचे थे। इसी दिन दोपहर बाद पास स्थित जलियांवाला बाग में एक सार्वजनिक सभा रखी गई थी। यह मैदान चारों तरफ से ऊंची दीवारों से घिरा था और बाहर निकलने के लिए केवल एक ही बेहद संकरा रास्ता था।

शाम लगभग 5:15 बजे जनरल डायर अपने 90 सशस्त्र सैनिकों और दो बख्तरबंद गाड़ियों के साथ मैदान के मुख्य द्वार पर पहुंचा। मुख्य रास्ते को सैनिकों से बंद करवा दिया गया। डायर ने निहत्थी भीड़ को तितर-बितर होने का कोई समय नहीं दिया और सीधे ‘फायर’ करने का हुक्म दे दिया।

सैनिकों ने लगातार 10 से 15 मिनट तक तब तक गोलीबारी की, जब तक कि उनके पास गोलियां खत्म नहीं हो गईं। करीब 1,650 राउंड गोलियां चलाई गईं। मैदान में मौजूद लोग जान बचाने के लिए दीवारों पर चढ़ने लगे और वहां मौजूद एक गहरे कुएं में कूद गए। कुछ ही देर में पूरा मैदान लाशों से पट गया।

जलियांवाला बाग में हताहतों की संख्या का विवाद

इस हत्याकांड में मारे गए और घायल हुए लोगों की सटीक संख्या को लेकर शुरुआत से ही मतभेद रहा है। ब्रिटिश प्रशासन ने आंकड़ों को कम करके आंकने का प्रयास किया था।

जाँच स्रोत / संस्थाशहीदों की संख्याघायलों की संख्या
ब्रिटिश सरकार का आधिकारिक आंकड़ा379लगभग 1,100
हंटर आयोग जांच रिपोर्ट379 से 4001,200 से अधिक
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की जांच1,000 से अधिक1,500 से अधिक

स्वतंत्रता संग्राम के प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय लोगों का मानना था कि शहीदों की वास्तविक संख्या कांग्रेस द्वारा दिए गए आंकड़ों से भी अधिक थी, क्योंकि कई परिवारों के शव कुएं और मलबे से बाद में मिले थे।

हत्याकांड के बाद के परिणाम और राष्ट्रीय प्रभाव

इस दुखद घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की दिशा को पूरी तरह बदल दिया। इस नरसंहार के बाद ब्रिटिश शासन का नैतिक आधार पूरी तरह समाप्त हो गया।

  • नाइटहुड उपाधि का त्याग: इस अमानवीय कृत्य के विरोध में राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई अपनी ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि वापस कर दी।
  • कैसर-ए-हिंद पदक वापसी: महात्मा गांधी ने बोअर युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा दिया गया ‘कैसर-ए-हिंद’ सम्मान लौटा दिया।
  • असहयोग आंदोलन की नींव: इस घटना ने महात्मा गांधी को अहसास कराया कि अंग्रेजों से न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती, जिसके बाद 1920 में पूरे देश में असहयोग आंदोलन शुरू हुआ।
  • उधम सिंह का प्रतिशोध: इस नरसंहार के चश्मदीद रहे क्रांतिकारी उधम सिंह ने बदला लेने की कसम खाई और 21 साल बाद, मार्च 1940 में लंदन में पंजाब के तत्कालीन उप-राज्यपाल माइकल ओ’डायर की गोली मारकर हत्या कर दी।

हंटर आयोग का गठन और उसकी विफलता

घटना के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ने के बाद ब्रिटिश सरकार ने अक्टूबर 1919 में लॉर्ड हंटर की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की। इसे हंटर आयोग कहा गया। आयोग ने जनरल डायर के कदम को ‘गंभीर भूल’ माना, लेकिन उस पर कोई आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया गया। डायर को केवल सैन्य पद से हटाकर इंग्लैंड वापस भेज दिया गया, जहां ब्रिटिश हाउस ऑफ लॉर्ड्स में उसके समर्थन में कोष जुटाया गया। इस ढुलमुल रवैये ने भारतीयों के आक्रोश को और बढ़ा दिया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रश्न: जलियांवाला बाग हत्याकांड किस तारीख को हुआ था?
उत्तर: यह घटना 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन अमृतसर में हुई थी।

प्रश्न: जलियांवाला बाग में गोलियां चलाने का आदेश किसने दिया था?
उत्तर: ब्रिटिश सेना के ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर ने निहत्थी भीड़ पर गोलियां चलाने का आदेश दिया था।

प्रश्न: इस नरसंहार के विरोध में रवींद्रनाथ टैगोर ने क्या किया था?
उत्तर: रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गई अपनी ‘नाइटहुड’ (सर) की उपाधि विरोधस्वरूप लौटा दी थी।

प्रश्न: जलियांवाला बाग हत्याकांड का बदला किसने लिया था?
उत्तर: क्रांतिकारी उधम सिंह ने मार्च 1940 में लंदन में पंजाब के पूर्व उप-राज्यपाल माइकल ओ’डायर की हत्या करके इसका बदला लिया था।

आधिकारिक जानकारी और नवीनतम अपडेट के लिए: https://amritsar.nic.in

यह लेख आज पत्रिका की एक्सप्लेनर डेस्क द्वारा सामान्य जागरूकता के लिए तैयार किया गया है। नियम और प्रक्रियाएं समय-समय पर बदल सकती हैं — कृपया आधिकारिक स्रोत से पुष्टि करें। सुधार/सुझाव: corrections@aajpatrika.com

सौरभ तिवारी
सौरभ तिवारी
सौरभ तिवारी आज पत्रिका में राष्ट्रीय एवं राजनीतिक मामलों के संपादक हैं। वे संसद और विधानसभाओं की कार्यवाही, सरकारी नीतियों, चुनाव, और भारत से जुड़ी बड़ी राष्ट्रीय खबरों की रिपोर्टिंग करते हैं। उनका ज़ोर तथ्य-आधारित, संतुलित और स्रोत-सहित रिपोर्टिंग पर रहता है — हर लेख में वे प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), संबंधित मंत्रालयों की विज्ञप्तियों और आधिकारिक दस्तावेज़ों का हवाला देते हैं। राय और विश्लेषण को वे समाचार से स्पष्ट रूप से अलग रखते हैं। सुझाव या तथ्य-सुधार के लिए: corrections@aajpatrika.com।

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