
दिल्ली में विजयदशमी समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सुशासन, सांस्कृतिक संरक्षण और ‘राष्ट्र प्रथम’ के संकल्प पर विशेष जोर दिया।
मुख्य बातें
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में विजयदशमी समारोह को संबोधित किया और देशवासियों को शुभकामनाएं दीं।
- बीते 12 वर्षों में विदेश ले जाई गईं 650 से अधिक प्राचीन मूर्तियों को भारत वापस लाया गया है।
- यूनेस्को द्वारा पिछले वर्ष दीपावली को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया गया था।
- प्रधानमंत्री ने ‘नागरिक देवो भव’ और ‘राम से राष्ट्र’ की अवधारणा के साथ विकसित भारत के निर्माण का आह्वान किया।
दिल्ली में आयोजित समारोह के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विजयदशमी संबोधन देश के सांस्कृतिक गौरव और प्रशासनिक दृष्टि को रेखांकित करने वाला रहा। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, 20 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित इस राष्ट्रीय कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने प्रभु श्रीराम के जीवन दर्शन, सुशासन के सिद्धांतों और भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में उठाये जा रहे कदमों पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की विजय का यह पर्व भारत की प्राण ऊर्जा है।
विजयदशमी संबोधन में प्रधानमंत्री ने क्या संदेश दिया?
दिल्ली के इस विशेष कार्यक्रम में विजयदशमी संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से राष्ट्रीय एकजुटता और ‘राष्ट्र प्रथम’ का संकल्प लेने का आह्वान किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभु श्रीराम के आदर्श हमें विकट परिस्थितियों में भी नीति मार्ग पर चलने, जन-कल्याण केंद्रित सुशासन स्थापित करने और देश की सांस्कृतिक संपदा की रक्षा करने की प्रेरणा देते हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत ‘सियावर रामचंद्र की जय’ के उद्घोष के साथ की और समस्त देशवासियों को पर्व की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि आज संपूर्ण देश राममय वातावरण में डूबा हुआ है और स्थान-स्थान पर आयोजित रामलीलाएं अत्याचार व आतंक के अंत की घोषणा करती हैं। यह परंपरा भारत की हजारों वर्ष पुरानी चेतना को जीवंत बनाए रखती है।
विजयदशमी संबोधन के मुख्य बिंदु और सुशासन का मॉडल
अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित्र का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने विषम परिस्थितियों में भी धर्म और सत्य का मार्ग कभी नहीं छोड़ा। संस्कृत श्लोक का संदर्भ देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रीराम न तो राज्याभिषेक से अत्यधिक प्रसन्न हुए और न ही वनवास के दुख से विचलित हुए। उन्होंने समाज के हर वर्ग को साथ लेकर समरसता के नए मानदंड स्थापित किए।
प्रधानमंत्री के अनुसार, रामराज्य का अर्थ एक ऐसे शासन मॉडल से है जहां किसी के साथ भेदभाव न हो, सभी नागरिकों को समान अवसर और न्याय मिले तथा सत्ता का एकमात्र ध्येय जन-कल्याण हो। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार ‘नागरिक देवो भव’ के मूल मंत्र पर कार्य कर रही है, जिसमें गरीब और वंचित वर्ग की सेवा को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए अपनी शक्ति और संसाधनों पर भरोसा करना ही सफलता का मूल मंत्र है।
सांस्कृतिक धरोहर की वापसी और यूनेस्को में भारत का सम्मान
देश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने एक महत्वपूर्ण आंकड़ा साझा किया। उन्होंने बताया कि सदियों के दौरान भारत की कई बहुमूल्य धरोहरों और प्रतिमाओं को अवैध रूप से विदेश ले जाया गया था। हालांकि, पिछले 12 वर्षों के निरंतर प्रयासों के चलते अब तक 650 से भी अधिक प्राचीन मूर्तियों को सफलतापूर्वक भारत वापस लाया जा चुका है।
इसके अतिरिक्त, उन्होंने भारत के बढ़ते वैश्विक सांस्कृतिक प्रभाव का उल्लेख किया। उन्होंने याद दिलाया कि पिछले वर्ष संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) ने दीपावली को ‘मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ (Intangible Cultural Heritage of Humanity) की सूची में शामिल किया था। इसके अलावा, भारत के कई अन्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों को भी विश्व धरोहर की सूची में स्थान प्राप्त हुआ है। यह उपलब्धि देश की सामूहिक इच्छाशक्ति और गौरवशाली इतिहास का प्रमाण है।
राष्ट्रीय सुरक्षा, एकजुटता और समाज को बांटने वाली शक्तियों का मुकाबला
संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने ऋग्वेद के श्लोक ‘समानो मन्त्रः समितिः समानी…’ का उल्लेख करते हुए देश की सभी राजनीतिक संस्थाओं, दलों और नागरिकों से राष्ट्रहित में एकजुट होने का आग्रह किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि देश का मान-सम्मान कम करने वाली शक्तियों, समाज में वैमनस्य फैलाने वाले तत्वों और भारतीय संस्कृति से विद्वेष रखने वाली मानसिकताओं से सतर्क रहने और उन्हें परास्त करने की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री ने बल देकर कहा कि जब कोई राष्ट्र सत्य और मानवता के पक्ष में खड़ा होता है, तो अंततः विजय उसी की होती है। देश के प्रत्येक नागरिक को अपने व्यक्तिगत और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि आंतरिक और बाह्य चुनौतियों से मुकाबला किया जा सके।
यह भी जानें: ‘राम से राष्ट्र’ का संकल्प और भावी लक्ष्य
अयोध्या में श्रीराम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय लिए गए संकल्पों की याद दिलाते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत ‘राम से राष्ट्र’ और ‘देव से देश’ के विचार पथ पर तेजी से अग्रसर है। विकसित भारत 2047 और आत्मनिर्भर भारत के सपनों को साकार करने के लिए सामूहिक जनभागीदारी सबसे बड़ी ताकत है। जिस प्रकार श्रीराम ने सीमित संसाधनों और जनशक्ति को जोड़कर असंभव कार्य को संभव बनाया, उसी प्रकार देशवासियों को भी अपनी सामूहिक क्षमता पर विश्वास रखना होगा।
- प्राचीन मूर्तियों की वापसी: बीते 12 वर्षों में विदेश भेजी गई 650 से अधिक अमूल्य प्राचीन मूर्तियों को पुनर्प्राप्त कर भारत लाया गया।
- वैश्विक पहचान: यूनेस्को द्वारा दीपावली को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में मान्यता दी गई है।
- सुशासन की संकल्पना: ‘नागरिक देवो भव’ के सिद्धांत पर आधारित भेदभाव-रहित और सर्वसमावेशी रामराज्य मॉडल की वकालत।
- राष्ट्रीय एकता का आह्वान: ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना के साथ समाज को बांटने वाली ताकतों का संगठित मुकाबला करने पर बल।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: प्रधानमंत्री के विजयदशमी संबोधन का मुख्य संदेश क्या था?
उत्तर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में ‘राष्ट्र प्रथम’ की भावना अपनाने, रामराज्य के सिद्धांतों पर आधारित सुशासन स्थापित करने और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण का संदेश दिया।
प्रश्न: पिछले 12 वर्षों में कितनी प्राचीन मूर्तियों को भारत वापस लाया गया है?
उत्तर: प्रेस सूचना ब्यूरो के अनुसार, बीते 12 वर्षों में 650 से अधिक प्राचीन और ऐतिहासिक मूर्तियों को विदेशों से वापस भारत लाया गया है।
प्रश्न: यूनेस्को द्वारा भारत की किस परंपरा को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत घोषित किया गया है?
उत्तर: पिछले वर्ष यूनेस्को ने दीपावली पर्व को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया था।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






