
पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के लिए 767 करोड़ रुपये के बजट के साथ नए दिशानिर्देश जारी किए हैं, जो 2030-31 तक 9 तटीय राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होंगे।
मुख्य बातें
- 767 करोड़ रुपये के स्वीकृत परिव्यय के साथ राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के दिशानिर्देश जारी हुए।
- यह केंद्रीय क्षेत्र योजना वर्ष 2030-31 तक 9 तटीय राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में प्रभावी रहेगी।
- तटीय क्षेत्रों में पारिस्थितिकी तंत्र बहाली, प्रदूषण प्रबंधन और मैंग्रोव संरक्षण पर फोकस रहेगा।
- मिशन का उद्देश्य भारत की नीली अर्थव्यवस्था की क्षमता को उभारना और व्यापार में सुगमता को बढ़ाना है।
राष्ट्रीय तटीय मिशन (NCM 2.0) को देश भर में सुचारू और प्रभावी ढंग से लागू करने के उद्देश्य से केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने नए दिशानिर्देश जारी किए हैं। नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इन आधिकारिक गाइडलाइंस की शुरुआत की। 767 करोड़ रुपये के कुल स्वीकृत परिव्यय वाली यह केंद्रीय क्षेत्र योजना देश के नौ तटीय राज्यों और चार केंद्र शासित प्रदेशों में वर्ष 2030-31 तक संचालित की जाएगी। इसका प्राथमिक उद्देश्य भारत के विस्तृत समुद्री तटों की पारिस्थितिकी को सुरक्षित करना और नीली अर्थव्यवस्था (Blue Economy) की संभावनाओं को आकार देना है।
राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 क्या है और इसके मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 केंद्र सरकार की 767 करोड़ रुपये के बजट वाली एक प्रमुख योजना है। इसका मुख्य उद्देश्य भारत के 9 तटीय राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, जैव विविधता संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और सतत पर्यटन को बढ़ावा देना है। यह योजना 2030-31 तक लागू रहेगी।
मंत्रालय के अनुसार यह मिशन केवल तटीय सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के विकास ढांचे को पर्यावरण अनुकूल दिशा देने का प्रयास है। कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस विचार को रेखांकित किया जिसमें भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के नीले चक्र को देश की नीली अर्थव्यवस्था की अपार क्षमता का प्रतीक बताया गया है। इसी दृष्टिकोण पर चलते हुए यह मिशन वर्ष 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के राष्ट्रीय संकल्प में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करेगा।
राष्ट्रीय तटीय मिशन के तहत किन प्रमुख क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा?
जारी गाइडलाइंस में योजना को जमीन पर उतारने के लिए कई रणनीतिक बिंदुओं को प्राथमिकता दी गई है। इसके अंतर्गत समुद्री इलाकों में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं और कटाव को रोकने के लिए व्यापक कदम उठाए जाएंगे।
- जोखिम आकलन और स्थानिक योजना: समुद्र तटीय इलाकों का वैज्ञानिक अध्ययन करके उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करना।
- पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली: मैंग्रोव, तटीय वनों और समुद्री जीवों के प्राकृतिक आवासों को फिर से समृद्ध बनाना।
- प्रदूषण प्रबंधन: नदियों और शहरों से बहकर समुद्र में जाने वाले कचरे व प्लास्टिक अपशिष्ट पर नियंत्रण पाना।
- सतत पर्यटन और संरक्षण: स्थानीय समुदायों की आजीविका को नुकसान पहुंचाए बिना पर्यावरण अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देना।
- अनुसंधान और क्षमता निर्माण: आधुनिक तकनीक, स्थानिक डेटा और स्थानीय संस्थाओं को सशक्त बनाना।
इसका असर: तटीय राज्यों और स्थानीय समुदायों को क्या फायदा होगा?
भारत की तटीय सीमा लगभग 7,516 किलोमीटर लंबी है, जिस पर करोड़ों लोगों की आजीविका निर्भर करती है। राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 के लागू होने से तटीय क्षेत्रों में रहने वाले मछुआरों, स्थानीय निवासियों और पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों को सीधे तौर पर सुरक्षा और नए अवसर मिलेंगे। चक्रवात, समुद्री तूफानों और तटीय कटाव जैसी समस्याओं से होने वाले आर्थिक नुकसान में कमी आएगी।
इसके साथ ही, यह गाइडलाइन तटीय क्षेत्रों में व्यापार करने में सुगमता (Ease of Doing Business) को भी आसान बनाएगी। स्पष्ट स्वीकृतियों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और सुव्यवस्थित ढांचे के कारण तटीय क्षेत्रों में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल निवेश को गति मिलेगी, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर नए रोजगारों का सृजन होगा।
समग्र सरकारी दृष्टिकोण और समन्वय पर बल
नया कार्यान्वयन ढांचा ‘समग्र सरकार’ (Whole of Government) के सिद्धांत पर आधारित है। इसका अर्थ है कि केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालय, राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन मिलकर एक एकीकृत योजना के तहत काम करेंगे। इससे विभागों के बीच आपसी तालमेल बेहतर होगा और योजनाओं में दोहराव की गुंजाइश खत्म होगी।
प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, इस मिशन को सागरमाला, तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) नियमों और मैंग्रोव पहल (MISHTI) जैसी मौजूदा सरकारी योजनाओं के साथ जोड़कर लागू किया जाएगा। निगरानी और जवाबदेही के कड़े मापदंड तय किए गए हैं ताकि तय समय सीमा के भीतर स्वीकृत बजट का पारदर्शी उपयोग हो सके।
2047 के विकसित भारत का विज़न और तटीय सुरक्षा
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में तटीय सुरक्षा भारत की खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत की नीली अर्थव्यवस्था का देश की कुल सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में बड़ा योगदान है। बंदरगाहों के विकास, समुद्री मत्स्य पालन और तटीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की नींव एक मजबूत और सुरक्षित तटीय पारिस्थितिकी पर टिकी है।
2030-31 तक चलने वाला यह मिशन तटीय पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत बनाकर भारत के दीर्घकालिक विकास लक्ष्यों को आधार प्रदान करेगा। इससे न केवल समुद्री जैव विविधता संरक्षित होगी, बल्कि वैश्विक मंचों पर भारत की पर्यावरण संरक्षण प्रतिबद्धता को भी मजबूती मिलेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: राष्ट्रीय तटीय मिशन 2.0 का कुल बजट कितना है?
उत्तर: इस मिशन के लिए केंद्र सरकार ने 767 करोड़ रुपये का स्वीकृत परिव्यय निर्धारित किया है।
प्रश्न: यह योजना किन-किन क्षेत्रों में लागू की जाएगी?
उत्तर: यह योजना भारत के 9 तटीय राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में वर्ष 2030-31 तक लागू की जाएगी।
प्रश्न: इस मिशन का क्रियान्वयन किस मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है?
उत्तर: इसका क्रियान्वयन केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






