
नागालैंड के त्सेमिन्यु जिले में 27 वर्षीय युवा ने एनएपीडीडीआर योजना और जिला डी-एडिक्शन सेंटर की मदद से नशा छोड़कर शुरू किया अपना स्व-रोजगार।
मुख्य बातें
- नागालैंड के त्सेमिन्यु जिले के 27 वर्षीय युवा ने एनएपीडीडीआर (NAPDDR) योजना की मदद से नशे से मुक्ति पाई।
- अनुसूचित जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाले इस युवा ने अब अपना स्व-रोजगार शुरू कर लिया है।
- त्सेमिन्यु के जिला डी-एडिक्शन सेंटर (DDAC) ने इलाज, परामर्श और पारिवारिक काउंसलिंग उपलब्ध कराई।
- सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की योजना नशा पीड़ितों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ रही है।
नशे की लत से जूझ रहे युवाओं के लिए पुनर्वास और सही परामर्श जीवन बदलने वाला साबित हो सकता है। नागालैंड के त्सेमिन्यु जिले में 27 वर्षीय युवा गैरी (बदला हुआ नाम) की कहानी यह साबित करती है कि सही उपचार और सरकारी सहायता से नशे की लत से पूरी तरह मुक्ति पाई जा सकती है। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार की ‘नशीले पदार्थों की मांग में कमी के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना’ (NAPDDR) और स्थानीय जिला डी-एडिक्शन सेंटर के संयुक्त प्रयास से यह युवा नशीले पदार्थों से दूर होकर अब स्व-रोजगार में लगा हुआ है।
नशे की लत से मुक्ति और पुनर्वास का प्रभावी मॉडल
नशे की लत से पीड़ित व्यक्तियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए समय पर चिकित्सा, व्यक्तिगत परामर्श और पारिवारिक सहयोग बेहद जरूरी है। एनएपीडीडीआर योजना के माध्यम से नागालैंड के त्सेमिन्यु जिले में संचालित जिला डी-एडिक्शन सेंटर ने परामर्श और व्यवहार मार्गदर्शन देकर 27 वर्षीय गैरी को पूरी तरह नशामुक्त बनाया। अब यह युवा आत्मनिर्भर बनकर अपना स्व-रोजगार सफलता से चला रहा है।
अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले गैरी ने मिडिल स्कूल तक पढ़ाई की थी। कम उम्र में भावनात्मक तनाव, दिशाहीनता और गलत संगति के कारण वे घातक पदार्थों के सेवन में उलझ गए। इसके चलते उनकी पढ़ाई बीच में ही छूट गई और उनका आत्मविश्वास पूरी तरह समाप्त हो गया। उनके परिवार को भी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ उपचार और देखभाल के लिए भारी आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ा।
शुरुआती दिनों में दूरदराज के इलाके और सीमित स्वास्थ्य सुविधाओं की वजह से चिकित्सा परामर्श और उपचार में देरी हुई। इसके अलावा सामाजिक बदनामी और नशामुक्ति के प्रति जागरूकता की कमी ने गैरी की कठिनाइयों को और बढ़ा दिया था। इसके बावजूद गैरी अपने जीवन को नए सिरे से शुरू करने और परिवार तथा समाज का विश्वास फिर से हासिल करने के लिए लगातार प्रयास करते रहे।
नागालैंड में नशे की लत से लड़ाई और जिला डी-एडिक्शन सेंटर
तमाम सामाजिक और भौगोलिक चुनौतियों के बावजूद, त्सेमिन्यु स्थित जिला डी-एडिक्शन सेंटर (DDAC) के संपर्क में आने के बाद गैरी के जीवन में बड़ा बदलाव आया। केंद्र सरकार की एनएपीडीडीआर योजना के तहत इस सेंटर ने गैरी को एक सुरक्षित, तनावमुक्त और अनुकूल माहौल प्रदान किया। डॉक्टरों और परामर्शदाताओं की देखरेख में उनके उपचार और पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हुई।
त्सेमिन्यु के जिला डी-एडिक्शन सेंटर द्वारा गैरी को निम्नलिखित मुख्य सेवाएं और सहायता प्रदान की गईं:
- व्यक्तिगत परामर्श और मनोवैज्ञानिक सहायता, जिससे मानसिक तनाव दूर करने में मदद मिली।
- नशामुक्ति उपचार और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर निकालने की डिटॉक्सिफिकेशन प्रक्रिया।
- प्रेरणादायक सत्र और व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए विशेष मार्गदर्शन।
- पारिवारिक परामर्श ताकि परिजन मरीज को सही माहौल और भावनात्मक सहारा दे सकें।
- समुदाय आधारित सामाजिक सहायता और मनोसामाजिक देखभाल के लिए विशेष कार्यक्रम।
- नशे की लत से दोबारा ग्रस्त होने से रोकने के लिए लगातार फॉलो-अप और सेहत की निगरानी।
एनएपीडीडीआर योजना और सामाजिक पुनर्वास की प्रक्रिया
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा संचालित ‘नशीले पदार्थों की मांग में कमी के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना’ (NAPDDR) देशभर में नशामुक्ति अभियान को मजबूती प्रदान कर रही है। इस योजना का उद्देश्य केवल नशा पीड़ितों का इलाज करना ही नहीं, बल्कि उन्हें समाज में फिर से स्थापित करना और रोजगार के अवसर पैदा करने में मदद करना भी है।
तनाव और निराशा से उबरने के बाद गैरी ने सेंटर में अनुशासन, स्वस्थ दिनचर्या और सामाजिक व्यवहार सीखा। पारिवारिक बैठकों और सामुदायिक सहयोग के माध्यम से समाज के साथ उनके रिश्ते बेहतर हुए। उपचार पूरा होने के बाद गैरी ने अपनी आजीविका के लिए स्व-रोजगार की शुरुआत की, जिससे उनका खोया हुआ आत्मविश्वास पूरी तरह वापस लौट आया।
उत्तर-पूर्वी राज्यों में नशामुक्ति और सामुदायिक सहभागिता
भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में नशीले पदार्थों के प्रसार को रोकने के लिए सामुदायिक नेतृत्व और जिला स्तर पर डी-एडिक्शन सेंटरों की स्थापना कारगर सिद्ध हो रही है। नागालैंड जैसे पहाड़ी राज्यों में दूरदराज के ग्रामीण इलाकों तक नशामुक्ति सेवाओं की पहुंच बनाना एक चुनौती रही है। स्थानीय कम्युनिटी लीडर्स और जिला प्रशासन के संयुक्त प्रयासों से अब इस दिशा में सकारात्मक परिणाम आ रहे हैं।
त्सेमिन्यु के जिला डी-एडिक्शन सेंटर ने स्थानीय स्तर पर नशाविरोधी जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को इसके दुष्प्रभावों से अवगत कराया है। जब परिवार और स्थानीय नागरिक मरीज को हीन भावना से देखने के बजाय मदद का हाथ बढ़ाते हैं, तो इलाज की सफलता की दर काफी बढ़ जाती है। गैरी का मामला इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सरकारी योजनाएं और सामाजिक सहयोग मिलकर किसी भी व्यक्ति को नशे की लत के अंधेरे से बाहर निकाल सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: एनएपीडीडीआर (NAPDDR) योजना क्या है और यह कैसे काम करती है?
उत्तर: एनएपीडीडीआर यानी ‘नशीले पदार्थों की मांग में कमी के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना’ भारत सरकार की एक पहल है, जो नशा पीड़ितों की पहचान, परामर्श, इलाज, पुनर्वास और समाज में उनके पुनर्एकीकरण के लिए आर्थिक व प्रशासनिक मदद देती है।
प्रश्न: त्सेमिन्यु जिले के गैरी ने नशे की लत से कैसे मुक्ति पाई?
उत्तर: गैरी ने त्सेमिन्यु स्थित जिला डी-एडिक्शन सेंटर (DDAC) में दाखिला लेकर व्यक्तिगत परामर्श, चिकित्सा उपचार, पारिवारिक काउंसलिंग और सामुदायिक सहयोग के माध्यम से नशे की लत से मुक्ति पाई और स्व-रोजगार शुरू किया।
प्रश्न: जिला डी-एडिक्शन सेंटर (DDAC) में मरीजों को कौन-कौन सी सुविधाएं दी जाती हैं?
उत्तर: इन सेंटरों पर नशा पीड़ितों को डिटॉक्सिफिकेशन, मनोवैज्ञानिक परामर्श, व्यवहार मार्गदर्शन, पारिवारिक काउंसलिंग, मनोसामाजिक देखभाल और पुनर्वास संबंधी मदद उपलब्ध कराई जाती है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






