पीआईबी के अनुसार, राष्ट्रपति ने भारत के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों और अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्तियां की हैं।
मुख्य बातें
- न्यायमूर्ति बिस्वरूप चौधरी कलकत्ता उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश बने हैं।
- न्यायमूर्ति प्रसेनजीत बिस्वास समेत छह अतिरिक्त न्यायाधीशों का नया कार्यकाल 31 अगस्त 2026 से प्रभावी होगा।
- यह नियुक्तियां भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों के तहत राष्ट्रपति द्वारा की गई हैं।
भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति ने भारत के प्रधान न्यायाधीश के परामर्श के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय में महत्वपूर्ण नियुक्तियां की हैं। पीआईबी के अनुसार, देश की न्यायपालिका को सुदृढ़ करने और अदालतों में मुकदमों के त्वरित निपटारे के लिए समय-समय पर इस प्रकार के कदम उठाए जाते हैं। इस नवीनतम अधिसूचना के माध्यम से कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों और अतिरिक्त न्यायाधीशों के पदों पर फेरबदल और नए कार्यकाल को मंजूरी दी गई है, जिससे न्यायिक प्रक्रियाओं में निरंतरता बनी रहे।
कलकत्ता उच्च न्यायालय में स्थायी और अतिरिक्त न्यायाधीशों की स्थिति
जारी की गई आधिकारिक सूची के अनुसार, न्यायपालिका के कामकाज को बेहतर बनाने के लिए यह निर्णय लिया गया है। इस प्रक्रिया में न्यायविदों की वरिष्ठता और उनके अब तक के कार्यकाल की समीक्षा की जाती है। उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की यह नियुक्तियां देश के न्यायिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जाती हैं। कलकत्ता उच्च न्यायालय देश के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण उच्च न्यायालयों में से एक है, जहां मुकदमों का भारी बोझ रहता है और न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या होना बेहद आवश्यक है।
- न्यायमूर्ति बिस्वरूप चौधरी को कलकत्ता उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त किया गया है।
- न्यायमूर्ति प्रसेनजीत बिस्वास को अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में छह महीने के नए कार्यकाल के लिए नियुक्त किया गया है।
- न्यायमूर्ति उदय कुमार को भी इस प्रशासनिक फेरबदल के तहत नई जिम्मेदारियां दी गई हैं।
- न्यायमूर्ति अजय कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुप्रतिम भट्टाचार्य का कार्यकाल भी इसी आदेश के तहत तय हुआ है।
- न्यायमूर्ति पार्थ सारथी चटर्जी और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बर रशीदी की नियुक्तियां भी इसमें शामिल हैं।
न्यायिक नियुक्तियों की संवैधानिक प्रक्रिया और महत्व
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 और 224 के तहत उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल का विस्तार किया जाता है। राष्ट्रपति देश के प्रधान न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल तथा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद यह निर्णय लेते हैं। कलकत्ता उच्च न्यायालय जैसे बड़े संस्थानों में अतिरिक्त न्यायाधीशों का कार्यकाल बढ़ाने से न्यायदान प्रक्रिया में बिना किसी बाधा के कार्य जारी रहता है। आम नागरिकों के लिए न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने में उच्च न्यायालयों की भूमिका सर्वोपरि होती है, और समय पर न्यायाधीशों की नियुक्ति इस प्रणाली को जीवंत रखती है।
कलकत्ता उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक महत्व और कार्यप्रणाली
वर्ष 1862 में स्थापित कलकत्ता उच्च न्यायालय भारत का सबसे पहला उच्च न्यायालय है। इसके अधिकार क्षेत्र में पश्चिम बंगाल और अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह आते हैं। यहां के फैसले देश की कानूनी व्यवस्था में एक मजबूत मिसाल पेश करते हैं। ऐसे में कलकत्ता उच्च न्यायालय में होने वाले हर प्रशासनिक और न्यायिक बदलाव पर कानूनी जगत की पैनी नजर रहती है। नए न्यायाधीशों के आने से मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और न्याय प्रणाली के प्रति आम जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा। आगामी 31 अगस्त से प्रभावी होने वाले ये नए कार्यकाल न्यायिक सेवा में स्थिरता लाएंगे।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






