
भारत सरकार के कानून मंत्रालय ने देश के शीर्ष 100 न्यायिक जिलों में भारी पेंडेंसी को कम करने के लिए राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLU) के कुलपतियों के साथ अहम बैठक की है।
मुख्य बातें
- देश भर की अदालतों में 5.8 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा सिर्फ 100 जिलों में हैं।
- कानून राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल की अध्यक्षता में 16 राज्यों के 19 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने हिस्सा लिया।
- लंबित मामलों के ज़मीनी विश्लेषण के लिए विधि विश्वविद्यालयों के प्रो-बोनो क्लबों और शोधकर्ताओं की मदद ली जाएगी।
- बैठक में वैकल्पिक विवाद निवारण, मध्यस्थता, समरी ट्रायल और प्ली बार्गेनिंग जैसे विकल्पों पर चर्चा हुई।
देश भर की अदालतों में लंबित आपराधिक मुकदमे की समस्या से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए भारत सरकार के कानून एवं न्याय मंत्रालय ने एक नया और व्यापक अभियान शुरू किया है। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) द्वारा जारी जानकारी के अनुसार, केंद्रीय कानून और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल के मार्गदर्शन में देश के उन शीर्ष 100 न्यायिक जिलों की पहचान की गई है जहाँ सबसे अधिक पेंडेंसी है। सरकार ने इन हॉटस्पॉट जिलों में मामलों के त्वरित निपटारे के लिए देश के प्रमुख राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLU) को एक मंच पर ला दिया है ताकि अकादमिक और शोध आधारित समाधान निकाले जा सकें।
लंबित आपराधिक मुकदमे कम करने के लिए विधि विश्वविद्यालयों को जोड़ा गया
लंबित आपराधिक मुकदमे घटाने के लिए कानून मंत्रालय ने देश भर के 16 राज्यों के 19 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए एक उच्चस्तरीय बैठक की। इस अहम चर्चा में न्याय विभाग के सचिव, पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो (BPR&D) के महानिदेशक और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के महानिदेशक समेत कई वरिष्ठ अधिकारी भौतिक रूप से उपस्थित रहे। अधिकारियों और शिक्षाविदों ने मिलकर यह रणनीति बनाई कि कैसे इन विश्वविद्यालयों के छात्र और शोधकर्ता जिला अदालतों की पेंडेंसी को कम करने में मदद कर सकते हैं।
शीर्ष 100 जिलों में आधे से अधिक मामले
वर्तमान स्थिति के अनुसार, पूरे देश की विभिन्न अदालतों में 5.8 करोड़ से अधिक मामले लंबित पड़े हुए हैं, जिनमें से अधिकांश जिला और अधीनस्थ न्यायालयों से जुड़े हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि देश के कुल लंबित मामलों का आधा हिस्सा अकेले उन 100 जिलों से आता है जिनकी पहचान इस विशेष मिशन के लिए की गई है। सरकार ने इन खास क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करते हुए समस्याओं के मूल कारणों का पता लगाने का फैसला किया है ताकि न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक सुलभ और तेज बनाया जा सके।
विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए संभावित समाधान
- चयनित जिलों में मुकदमों की पेंडेंसी के ज़मीनी स्तर के विश्लेषण के लिए विधि छात्रों और प्रो-बोनो क्लबों का उपयोग करना।
- अदालतों में अप्रासंगिक मामलों की पहचान कर उन्हें समय पर समाप्त करना।
- मामलों की रूपरेखा तैयार करना और तारीखें टालने के मौजूदा प्रबंधन में सुधार लाना।
- वैकल्पिक विवाद निवारण (ADR), मध्यस्थता, प्ली बार्गेनिंग और समरी ट्रायल जैसे तौर-तरीकों को अपनाना।
- जिला-विशिष्ट कारणों का गहराई से अध्ययन करके देरी के मुख्य बिंदुओं की पहचान करना।
यह भी जानें: अदालती पेंडेंसी का आम आदमी पर असर और पृष्ठभूमि
न्यायालयों में मुकदमों का लंबा खिंचना आम आदमी के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से भारी पड़ता है। जब एक साधारण विवाद या आपराधिक मामला वर्षों तक निचली अदालतों में अटका रहता है, तो न्याय की उम्मीद धूमिल होने लगती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत @2047 के दृष्टिकोण को पूरा करने के लिए एक सुलभ, कुशल, किफ़ायती, निष्पक्ष और त्वरित न्याय प्रणाली का होना अत्यंत आवश्यक माना गया है। इसी दिशा में अकादमिक संस्थानों को ज़मीनी हकीकत से जोड़कर व्यावहारिक नीतियां तैयार करने का यह अपनी तरह का एक अनूठा प्रयास है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? लंबित आपराधिक मुकदमे निपटाने की इस पहल की अगुवाई कौन कर रहा है?
उत्तर। इस पहल की अगुवाई केंद्रीय कानून और न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल कर रहे हैं, जिसके तहत कानून मंत्रालय और राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय मिलकर काम कर रहे हैं।
प्रश्न? देश की अदालतों में कुल कितने मामले लंबित हैं?
उत्तर। प्रेस सूचना ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, देश भर की अदालतों में 5.8 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
प्रश्न? इस योजना में किन संस्थानों को शामिल किया गया है?
उत्तर। इस योजना में 16 राज्यों के 19 राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLU) के कुलपतियों, शोधकर्ताओं और प्रो-बोनो क्लबों को शामिल किया गया है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






