
केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने डीआईएलआरएमपी 3.0 के परिचालन दिशा-निर्देशों का औपचारिक शुभारंभ किया। 100 फीसदी केंद्रीय वित्तपोषण से शुरू हो रही इस योजना से जमीन से जुड़े दस्तावेज और रजिस्ट्री प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल होगी।
मुख्य बातें
- ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कृषि भवन में डीआईएलआरएमपी 3.0 के दिशा-निर्देश लॉन्च किए।
- प्रोग्राम के तहत प्रत्येक जमीन के टुकड़े को 14-अंकों का यूनिक भू-आधार (ULPIN) दिया जाएगा।
- ज़्यादा भीड़-भाड़ वाले 75 सब-रजिस्ट्रार दफ्तरों को पासपोर्ट सेवा केंद्रों की तर्ज पर ‘पंजीकरण सेवा केंद्र’ बनाया जाएगा।
- शहरी क्षेत्रों में जीआईएस मैपिंग के जरिए ‘नक्शा’ (NAKSHA) प्रोजेक्ट के तहत अर्बन प्रॉपर्टी कार्ड जारी होंगे।
- योजना का 100 प्रतिशत खर्च केंद्र सरकार उठाएगी और इसे पीएफएमएस प्रणाली के माध्यम से लागू किया जाएगा।
केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली के कृषि भवन में आयोजित एक हाइब्रिड कार्यक्रम के दौरान डीआईएलआरएमपी 3.0 के परिचालन दिशा-निर्देशों का औपचारिक शुभारंभ किया। इस अवसर पर देश भर के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राजस्व एवं पंजीकरण मंत्रियों, प्रधान सचिवों तथा वरिष्ठ अधिकारियों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हिस्सा लिया। प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के अनुसार, इस नए चरण का मुख्य उद्देश्य देश में भूमि अभिलेखों के अलग-अलग डिजिटलीकरण से आगे बढ़कर एक एकीकृत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना है।
डीआईएलआरएमपी 3.0 क्या है और इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?
डीआईएलआरएमपी 3.0 केंद्र सरकार के डिजिटल इंडिया भूमि रिकॉर्ड आधुनिकीकरण कार्यक्रम का तीसरा चरण है, जिसे 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्तपोषण के साथ लागू किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य देश भर के भूमि रिकॉर्ड को एक पारदर्शी प्रणाली से जोड़ना, 14 अंकों का भू-आधार जारी करना और पंजीकरण प्रक्रियाओं में तकनीकी सुधार लाकर नागरिकों के जीवन को आसान बनाना है।
शुभारंभ कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत में जमीन का संबंध केवल संपत्ति से नहीं, बल्कि भावनात्मक और पारिवारिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पहले चरण में 99.90 प्रतिशत अधिकारों के अभिलेखों (RoR) और 97 प्रतिशत कैडस्ट्रल मानचित्रों का डिजिटलीकरण पूरा हो चुका है। साथ ही देश के 99 प्रतिशत सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों का कंप्यूटरीकरण भी पूरा किया जा चुका है। नया चरण अब इन सभी प्रणालियों को आपस में जोड़ने पर केंद्रित है।
डीआईएलआरएमपी 3.0 के मुख्य तकनीकी घटक और सुविधाएं
भूमि संसाधन विभाग (DoLR) द्वारा तैयार किए गए नए परिचालन दिशानिर्देशों में कई प्रमुख घटकों को शामिल किया गया है:
- जीआईएस-इनेबल्ड लैंड स्टैक: यह एक एकीकृत डिजिटल ढांचा है जो जीआईएस नक्शों, अधिकारों के रिकॉर्ड, रजिस्ट्री और अदालती मामलों की जानकारी को एक जगह लाएगा। राज्यों के लैंड स्टैक मिलकर एक ‘राष्ट्रीय लैंड स्टैक’ बनाएंगे।
- यूनिवर्सल भू-आधार (ULPIN): प्रत्येक भू-खंड को 14 अंकों की विशिष्ट पहचान संख्या दी जाएगी, जिससे दोहरे मालिकाना हक के दावों और फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी।
- पंजीकरण सेवा केंद्र (RSK): पासपोर्ट सेवा केंद्रों की तर्ज पर अधिक भीड़-भाड़ वाले 75 सब-रजिस्ट्रार कार्यालयों में डिजिटल कतार प्रबंधन और अत्याधुनिक नागरिक सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
- विरासत रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण: पुरानी पुश्तैनी संपत्तियों और दस्तावेजों को व्यवस्थित तरीके से स्कैन करके सुरक्षित डिजिटल रिपोजिटरी में रखा जाएगा।
- पंजीकरण रिपोजिटरी: यह एक ऐसा डिजिटल मंच होगा जहां जमीन की पुरानी खरीद-बिक्री के इतिहास और उस पर किसी बैंक ऋण या देनदारी की स्पष्ट जानकारी मिलेगी।
- पेपरलेस राजस्व अदालतें: राजस्व न्यायालय मामला प्रबंधन प्रणाली (RCCMS) को सीधे भूमि रिकॉर्ड से जोड़ा जाएगा, जिससे नामांतरण (म्यूटेशन) के मामले तेजी से सुलझेंगे।
- अर्बन लैंड मैपिंग (NAKSHA): शहरी क्षेत्रों के लिए जीआईएस-आधारित मैपिंग करके नागरिकों को अर्बन प्रॉपर्टी (UrPro) कार्ड दिए जाएंगे।
इसका असर: आम नागरिकों और किसानों को क्या फायदा होगा?
जमीन से जुड़े कागजात हासिल करने के लिए आम नागरिकों और किसानों को अक्सर सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। इस योजना के पूरी तरह लागू होने के बाद जमीन के रिकॉर्ड मोबाइल या इंटरनेट के जरिए तुरंत सत्यापित किए जा सकेंगे। जब प्रत्येक जमीन के टुकड़े का 14 अंकों वाला भू-आधार दर्ज होगा, तो बैंक से कृषि ऋण या संपत्ति ऋण लेना बहुत आसान हो जाएगा। बैंक बिना किसी लंबी कागजी प्रक्रिया के डिजिटल तरीके से जमीन के स्वामित्व और देनदारी की जांच कर सकेंगे।
इसके अलावा, पुश्तैनी जमीनों के पुराने रिकॉर्ड डिजिटल हो जाने से पारिवारिक विवादों और अदालती मुकदमों में भारी कमी आएगी। सब-रजिस्ट्रार दफ्तरों को पंजीकरण सेवा केंद्र में बदलने से रजिस्ट्री कराने में लगने वाला समय घटेगा और कतार में खड़े होने की मजबूरी खत्म होगी।
कार्यान्वयन और निगरानी की व्यवस्था कैसे होगी?
कार्यक्रम के दौरान ग्रामीण विकास राज्य मंत्री डॉ. चंद्र शेखर पेम्मासानी ने बताया कि नया चरण भू-स्थानिक सटीकता और जियो-रेफरेंस्ड नक्शों पर ध्यान केंद्रित करता है। वहीं भूमि संसाधन विभाग के सचिव नरेंद्र भूषण और संयुक्त सचिव पारिकिपांडला नरहरि ने योजना की तकनीकी संरचना पर विस्तार से जानकारी दी।
यह पूरी योजना शत-प्रतिशत केंद्रीय बजट से चलाई जाएगी। राज्यों को वित्तीय आवंटन सार्वजनिक वित्तीय प्रबंधन प्रणाली (PFMS) के माध्यम से प्रदर्शन के आधार पर जारी किया जाएगा। पूरी परियोजना की निगरानी के लिए एक उन्नत डीआईएलआरएमपी-एमआईएस डैशबोर्ड तैयार किया गया है, जिसकी समीक्षा परियोजना अनुमोदन एवं निगरानी समिति (PS&MC) करेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न: डीआईएलआरएमपी 3.0 के तहत भू-आधार (ULPIN) क्या है?
उत्तर: भू-आधार या यूएलपीआईएन (ULPIN) 14 अंकों का एक यूनिक नंबर है जो हर जमीन के टुकड़े को उसकी भौगोलिक स्थिति के आधार पर दिया जाता है।
प्रश्न: पंजीकरण सेवा केंद्र (RSK) क्या हैं?
उत्तर: ये अत्याधुनिक नागरिक सुविधा केंद्र हैं जो अत्यधिक भीड़ वाले 75 सब-रजिस्ट्रार दफ्तरों में पासपोर्ट सेवा केंद्रों की तर्ज पर बनाए जा रहे हैं।
प्रश्न: क्या डीआईएलआरएमपी 3.0 का खर्च राज्यों को उठाना होगा?
उत्तर: नहीं, इस योजना का 100 प्रतिशत वित्तपोषण केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






