
भारतीय रिज़र्व बैंक ने फॉरेन एक्सचेंज डेरिवेटिव्स और नॉन-डेलिविरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स को लेकर नए निर्देश जारी किए हैं।
मुख्य बातें
- भारतीय रिज़र्व बैंक ने एनडीडीसी केवल हेजिंग के उद्देश्य से देने का निर्देश दिया है।
- अधिकृत डीलर्स को फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) रखना होगा।
- FERR की राशि कॉन्ट्रैक्ट के नोटोनल अमाउंट के 20 प्रतिशत के बराबर होगी।
- यह नियम 12 अक्टूबर 2026 के सर्कुलर के बाद किए गए कॉन्ट्रैक्ट्स पर लागू होंगे।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने फॉरेन एक्सचेंज डेरिवेटिव्स और इंटर-बैंक डीलिंग से जुड़े नियमों में बड़ा बदलाव किया है। केंद्रीय बैंक द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, अब गैर-निवासी उपयोगकर्ताओं को भारतीय रुपये से जुड़े नॉन-डेलिविरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स (NDDCs) केवल हेजिंग उद्देश्यों के लिए ही दिए जा सकेंगे। यह नया बदलाव 12 अक्टूबर 2026 को जारी सर्कुलर RBI/2026-27/293 के तहत लागू किया गया है, जिस पर सभी अधिकृत डीलर्स को अमल करना होगा।
भारतीय रिज़र्व बैंक के नए एनडीडीसी नियम क्या हैं?
भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा जारी नए दिशानिर्देशों के अनुसार, नॉन-डेलिविरेबल डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स (NDDCs) involving INR अब बिना किसी उद्देश्य की पाबंदी के नहीं दिए जाएंगे। इससे पहले, ऑपरेटिंग आईएफएससी बैंकिंग यूनिट और स्टैंडअलोन प्राइमरी डीलर्स को बिना उद्देश्य की शर्त के एनडीडीसी की पेशकश करने की अनुमति थी। अब इस समीक्षा के बाद यह साफ कर दिया गया है कि अधिकृत डीलर्स केवल हेजिंग के लिए ही ऐसे अनुबंधों की पेशकश कर सकेंगे।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के विनियामक बदलावों से विदेशी मुद्रा बाजार में अधिक पारदर्शिता और स्थिरता आएगी। नियमों का उद्देश्य सट्टा गतिविधियों पर लगाम कसना और जोखिम प्रबंधन को मजबूत करना है। अधिकृत डीलर्स को इन नए नियमों का सख्ती से पालन करने का निर्देश दिया गया है ताकि किसी भी तरह की विनियामक चूक से बचा जा सके।
फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) से जुड़ी मुख्य बातें
केंद्रीय बैंक ने विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों के संबंध में एक फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व (FERR) अनिवार्य कर दिया है। अधिकृत डीलर्स को अपनी खुद की परिसंपत्तियों और देनदारियों के मुद्रा जोखिम को हेज करने के लिए किए जाने वाले अनुबंधों पर यह रिजर्व रखना होगा।
- यह रिजर्व उन सभी फॉरेन एक्सचेंज डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स पर लागू होगा जहां अधिकृत डीलर भारतीय रुपये के बदले विदेशी मुद्रा खरीद रहा है।
- FERR की राशि प्रत्येक डेरिवेटिव अनुबंध के नोटोनल अमाउंट के भारतीय रुपये के समतुल्य का 20 प्रतिशत होगी।
- इस रिजर्व को भारतीय रिज़र्व बैंक के पास भारत में नकद के रूप में प्रतिदिन जमा करना और बनाए रखना होगा।
- यह व्यवस्था अनुबंध के समाप्त होने तक लगातार जारी रखनी होगी।
यह भी जानें: विदेशी मुद्रा बाजार पर इसका असर और पृष्ठभूमि
भारतीय रिज़र्व बैंक देश के विदेशी मुद्रा बाजार को नियंत्रित और विनियमित करने के लिए समय-समय पर मास्टर डायरेक्शंस में संशोधन करता है। विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (FEMA), 1999 और भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत प्रदत्त शक्तियों का उपयोग करके इन निर्देशों को जारी किया गया है। यह नए निर्देश उन सभी विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों पर लागू होंगे जो इन निर्देशों के जारी होने के बाद किए जाएंगे।
आम निवेशकों और वित्तीय संस्थानों के लिए यह समझना जरूरी है कि केंद्रीय बैंक के ये कदम वित्तीय प्रणाली को सुरक्षित रखने के लिए उठाए जाते हैं। जब बैंक या वित्तीय संस्थान विदेशी मुद्रा लेनदेन करते हैं, तो विनिमय दर में उतार-चढ़ाव का जोखिम हमेशा बना रहता है। FERR की अनिवार्यता से बैंकों और डीलर्स के पास जोखिम से निपटने के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच रहेगा, जिससे भविष्य में किसी बड़े वित्तीय झटके से बचा जा सके।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्रश्न? नए नियम कब से लागू किए गए हैं?
उत्तर। ये निर्देश 12 अक्टूबर 2026 को जारी किए गए सर्कुलर के बाद किए जाने वाले विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव अनुबंधों पर लागू होते हैं।
प्रश्न? FERR की राशि कितनी तय की गई है?
उत्तर। FERR की राशि प्रत्येक डेरिवेटिव अनुबंध के नोटोनल अमाउंट के भारतीय रुपये के समतुल्य का 20 प्रतिशत होगी।
यह रिपोर्ट RBI (भारतीय रिज़र्व बैंक) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: RBI (भारतीय रिज़र्व बैंक)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






