प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी) योजना के तहत 115 लाख हेक्टेयर भूमि ड्रिप सिंचाई के दायरे में आई है। जानिए वित्तीय सब्सिडी और नए प्रावधान।
मुख्य बातें
- जुलाई 2026 तक 115 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि ‘प्रति बूंद अधिक फसल’ योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई से कवर की गई है।
- छोटे और सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत तथा अन्य किसानों को 45 प्रतिशत तक की दर से अधिकतम 5 हेक्टेयर तक वित्तीय सब्सिडी दी जाती है।
- वित्त वर्ष 2025-26 के लिए पीएम-आरकेवीवाई के तहत 8,957.72 करोड़ रुपये मंजूर हुए हैं, जिसमें पीडीएमसी के लिए 3,226.36 करोड़ रुपये शामिल हैं।
- महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और राजस्थान वर्ष 2025-26 में सूक्ष्म सिंचाई अपनाने में अग्रणी रहे हैं।
- राज्यों को खेत तालाबों और डिग्गी जैसे जल संचयन ढांचे के निर्माण पर पूर्व निर्धारित फंडिंग सीमा से अधिक व्यय करने की छूट मिली है।
प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी) योजना ने जुलाई 2026 तक देश भर में 115 लाख हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि को सूक्ष्म और बूंद-बूंद सिंचाई के दायरे में लाकर एक नया मील का पत्थर हासिल किया है। पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, यह उपलब्धि भारत के कुल शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 8.11 प्रतिशत है। केंद्र सरकार द्वारा संचालित यह योजना जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, खेती की लागत घटाने और किसानों की आय में सुधार करने के उद्देश्य से लागू की जा रही है। देश में उपलब्ध जल संसाधनों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कृषि सिंचाई में उपयोग होता है, जबकि देश का लगभग 50 प्रतिशत बोया गया क्षेत्र ही वर्तमान में सिंचाई की सुविधाओं का लाभ उठा पाता है। ऐसे में जल प्रबंधन को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानते हुए इस योजना का क्रियान्वयन तेज गति से किया जा रहा है।
प्रति बूंद अधिक फसल योजना का दायरा और वित्तीय सहायता
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित प्रति बूंद अधिक फसल योजना के तहत किसानों को आधुनिक सिंचाई तकनीक अपनाने के लिए वित्तीय सब्सिडी दी जाती है। इस योजना के अंतर्गत प्रत्येक पात्र किसान को अधिकतम 5 हेक्टेयर भूमि तक सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली स्थापित करने के लिए सहायता प्रदान की जाती है। योजना के नियमों के अनुसार छोटे और सीमांत किसानों को लागत का 55 प्रतिशत तथा अन्य श्रेणी के किसानों को 45 प्रतिशत तक का वित्तीय अनुदान दिया जाता है। केंद्र सरकार ने पिछले तीन वर्षों के दौरान इस मद में 8,123.24 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता जारी की है। इसके अतिरिक्त, राज्य सरकारें भी अपने बजट से किसानों को पूरक सब्सिडी प्रदान करती हैं। किसानों को एक ही भूमि पर सात वर्ष की अवधि पूर्ण होने के पश्चात दोबारा सब्सिडी प्राप्त करने का प्रावधान किया गया है।
वर्ष 2025-26 के दौरान प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (पीएम-आरकेवीवाई) के तहत कुल 8,957.72 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई है, जिसमें से विशेष रूप से 3,226.36 करोड़ रुपये का आवंटन प्रति बूंद अधिक फसल घटक के लिए किया गया है। चालू वित्त वर्ष में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और राजस्थान राज्यों ने इस योजना के तहत ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई को अपनाने में शीर्ष स्थान हासिल किया है। वर्ष 2025-26 में लगभग 12.30 लाख किसानों को इस योजना से सीधा लाभ पहुंचा है, जिनमें महिला किसानों की हिस्सेदारी लगभग 20 प्रतिशत दर्ज की गई है।
जल संरक्षण के नए नियम और प्रति बूंद अधिक फसल के घटक
सरकार ने प्रति बूंद अधिक फसल योजना के दिशानिर्देशों में महत्वपूर्ण बदलाव करते हुए जल भंडारण और संरक्षण गतिविधियों के लिए पहले से निर्धारित फंडिंग सीमाओं को समाप्त कर दिया है। पूर्व में, सामान्य राज्यों में कुल बजटीय आवंटन का अधिकतम 20 प्रतिशत और पूर्वोत्तर तथा हिमालयी राज्यों (साथ ही जम्मू-कश्मीर व लद्दाख) के लिए 40 प्रतिशत तक ही जल संचयन संरचनाओं पर व्यय करने की अनुमति थी। नए संशोधनों के बाद, राज्य अपनी स्थानीय भौगोलिक आवश्यकताओं के अनुसार इन सीमाओं से अधिक धनराशि डिग्गी, खेत तालाब और कम्युनिटी वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के निर्माण पर खर्च कर सकते हैं।
इस योजना में मुख्यतः दो प्रकार की सिंचाई प्रणालियों को प्रोत्साहित किया जाता है:
- ड्रिप सिंचाई प्रणाली: इसमें ऑन-लाइन ड्रिप (असमर्थ दूरी वाली बागवानी फसलों के लिए उपयुक्त) और इन-लाइन ड्रिप (समान दूरी वाली फसलों के लिए उपयुक्त) शामिल हैं, जो पानी और फर्टिगेशन पोषक तत्वों को सीधे जड़ों तक पहुंचाती हैं।
- स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली: इसमें पोर्टेबल स्प्रिंकलर, सूक्ष्म (माइक्रो) स्प्रिंकलर, मिनी स्प्रिंकलर, अर्ध-स्थायी स्प्रिंकलर और बड़ी क्षमता वाली रेन-गन शामिल हैं, जो वर्षा की भांति फसलों पर जल छिड़काव करती हैं।
प्रति बूंद अधिक फसल का ऐतिहासिक सफर और विकास
सूक्ष्म सिंचाई को बढ़ावा देने की यह राष्ट्रीय पहल सबसे पहले जनवरी 2006 में केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में आरंभ हुई थी। इसके पश्चात वर्ष 2010-11 में इसका विस्तार करके इसे ‘राष्ट्रीय सूक्ष्म सिंचाई मिशन’ (NMMI) का नाम दिया गया। वर्ष 2014-15 में इसे राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन के तहत शामिल किया गया। बाद में, वर्ष 2015-16 से 2021-22 तक इसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) के तहत आधिकारिक रूप से प्रति बूंद अधिक फसल नाम दिया गया। वर्ष 2022-23 से यह योजना प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) का प्रमुख घटक बनकर कार्य कर रही है, जिसे अक्टूबर 2024 में 9 कृषि योजनाओं को मिलाकर पुनर्गठित किया गया था।
किसानों की आय और उत्पादकता पर प्रभाव
नीति आयोग द्वारा किए गए मूल्यांकन और आर्थिक समीक्षा 2020-21 के अध्ययनों के अनुसार, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई अपनाने से जल उपयोग में 20 से 48 प्रतिशत की बचत हुई है। इसके साथ ही बिजली की खपत में 10 से 17 प्रतिशत, उर्वरक की खपत में 11 से 19 प्रतिशत और श्रम लागत में 30 से 40 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इन तकनीकों के प्रयोग से फसल पैदावार में 20 से 38 प्रतिशत की वृद्धि और किसानों की शुद्ध आय में 10 से 69 प्रतिशत तक का इजाफा देखा गया है।
उदाहरण के लिए, आंध्र प्रदेश के पलनाडु जिले के किसान एल.ए.एम. श्रीनिवास राव ने अपने दो एकड़ के नींबू के बाग में पारंपरिक बाढ़ सिंचाई के बजाय प्रति बूंद अधिक फसल योजना की मदद से ड्रिप और फर्टिगेशन तकनीक अपनाई। इसके परिणामस्वरूप उनकी फसल उपज 90 क्विंटल से बढ़कर 105 क्विंटल प्रति एकड़ हो गई। खेती की लागत घटने और उत्पादकता बढ़ने से उनकी शुद्ध वार्षिक आय 1.5 लाख रुपये से बढ़कर 2.85 लाख रुपये तक पहुंच गई।
आगामी वर्षों में, प्रति बूंद अधिक फसल का यह मॉडल देश के सूखा प्रभावित क्षेत्रों और भूजल स्तर में गिरावट का सामना कर रहे इलाकों के लिए एक वरदान साबित हो रहा है। केंद्र और राज्य सरकारों के त्रि-स्तरीय कार्यान्वयन ढांचे (एनएससी, एसएलएससी और डीएलआईसी) के माध्यम से यह योजना भारतीय कृषि को अधिक टिकाऊ, जलवायु-अनुकूल और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।
यह रिपोर्ट PIB (पत्र सूचना कार्यालय) द्वारा जारी आधिकारिक जानकारी पर आधारित है। स्रोत: PIB (पत्र सूचना कार्यालय)। त्रुटि की सूचना: corrections@aajpatrika.com






