Saturday, March 28, 2026

महाशिवरात्रि 2025: जानें पूजा का सही समय, महत्व और त्रिवेणी संगम स्नान का पुण्य

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महाशिवरात्रि का पर्व इस वर्ष 26 फरवरी को धूमधाम से मनाया जाएगा। इस दिन देशभर के शिवालयों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ेगी और त्रिवेणी संगम सहित विभिन्न पवित्र नदियों में श्रद्धालु पुण्य की डुबकी लगाएंगे। इस बार महाशिवरात्रि पर एक दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो इस पर्व को और भी खास बना देगा। ज्योतिर्विदों के अनुसार, महाशिवरात्रि पर चतुर्दशी तिथि के साथ श्रवण और घनिष्ठा नक्षत्र का विशेष संयोग बन रहा है। इस अवसर पर भगवान शिव की आराधना और व्रत का विशेष महत्व बताया गया है।

महाशिवरात्रि का धार्मिक महत्व

महाशिवरात्रि हिन्दू धर्म में एक अत्यंत पावन पर्व माना जाता है। यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की याद में मनाया जाता है। इस दिन शिव भक्त उपवास रखते हैं, रात्रि जागरण करते हैं और शिवलिंग पर बेलपत्र, दूध, जल और धतूरा अर्पित करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग की पूजा करने से समस्त पापों का नाश होता है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

त्रिवेणी संगम में डुबकी लगाने का महत्व

महाशिवरात्रि के अवसर पर संगम नगरी प्रयागराज में त्रिवेणी संगम पर लाखों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाएंगे। मान्यता है कि इस दिन गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम में स्नान करने से पापों से मुक्ति मिलती है और पुण्य की प्राप्ति होती है। संगम क्षेत्र में विशेष आयोजन किए जाएंगे और सुरक्षा के कड़े इंतजाम रहेंगे।

शिवालयों में विशेष अनुष्ठान और रात्रि जागरण

महाशिवरात्रि के दिन शिवालयों में भव्य पूजा-अर्चना और रात्रि जागरण का आयोजन किया जाता है। भक्त रात्रि भर भजन-कीर्तन करते हैं और शिवलिंग पर जलाभिषेक करते हैं। काशी विश्वनाथ, महाकालेश्वर, केदारनाथ, बैजनाथ धाम और अन्य प्रसिद्ध शिव मंदिरों में विशेष अनुष्ठान होंगे। इस बार दुर्लभ संयोग के कारण शिवरात्रि की महिमा और भी बढ़ जाएगी।

इस वर्ष का दुर्लभ संयोग

ज्योतिर्विद आचार्य देवेंद्र प्रसाद त्रिपाठी के अनुसार, फाल्गुन कृष्णपक्ष की त्रयोदशी तिथि 26 फरवरी की सुबह 9.19 बजे तक है। इसके बाद चतुर्दशी तिथि शुरू होगी, जो 27 फरवरी की सुबह 8.08 बजे तक रहेगी। महाशिवरात्रि का व्रत चतुर्दशी तिथि में किया जाता है, इसलिए इस दिन का महत्व बढ़ जाता है। इसके साथ ही इस दिन श्रवण नक्षत्र शाम 4.10 बजे तक रहेगा, जिसके बाद घनिष्ठा नक्षत्र आरंभ होगा। इन दोनों नक्षत्रों का संबंध भगवान शिव से माना जाता है, जिससे इस वर्ष का महाशिवरात्रि पर्व और अधिक शुभ फलदायी होगा।

महाशिवरात्रि व्रत और पूजा विधि

महाशिवरात्रि के दिन व्रत रखने और शिव पूजा करने की विशेष विधि होती है। इस दिन भक्त प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और व्रत का संकल्प लेते हैं। दिनभर निराहार रहकर शिवलिंग का जल, दूध, शहद, बेलपत्र, धतूरा, आक, चंदन, भस्म, फल और मिष्ठान से पूजन किया जाता है। चार प्रहर की पूजा का विशेष महत्व होता है। प्रत्येक प्रहर में भगवान शिव को अलग-अलग पदार्थ अर्पित किए जाते हैं।

चार प्रहर की पूजा विधि:

  1. प्रथम प्रहर: जल, दूध और शहद से अभिषेक किया जाता है।
  2. द्वितीय प्रहर: दही और बेलपत्र अर्पित किए जाते हैं।
  3. तृतीय प्रहर: घी और गन्ने के रस से अभिषेक किया जाता है।
  4. चतुर्थ प्रहर: शहद और भस्म का प्रयोग कर भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है।

रात्रि के चारों प्रहर में भगवान शिव के भजन-कीर्तन और मंत्रोच्चार करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

महाशिवरात्रि का ज्योतिषीय प्रभाव

इस बार महाशिवरात्रि पर ग्रहों की स्थिति भी बेहद शुभ रहने वाली है। इस दिन शनि और गुरु की विशेष दृष्टि भगवान शिव की कृपा दिलाने में सहायक होगी। शनि देव न्याय के देवता हैं और शिव जी को समर्पित माने जाते हैं। वहीं गुरु ग्रह का प्रभाव भी भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति देने वाला रहेगा।

महाशिवरात्रि पर विशेष उपाय

महाशिवरात्रि के दिन कुछ विशेष उपाय करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है।

  1. रुद्राभिषेक करें: शिवलिंग पर गंगाजल और दूध से अभिषेक करें।
  2. मंत्र जाप करें: “ॐ नमः शिवाय” का 108 बार जाप करें।
  3. बेलपत्र अर्पित करें: शिवलिंग पर तीन पत्तियों वाला बेलपत्र चढ़ाने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं।
  4. गरीबों को दान करें: इस दिन दान-पुण्य करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।
  5. रात्रि जागरण करें: भगवान शिव के भजन-कीर्तन करें और रात्रि जागरण करें।

महाशिवरात्रि से जुड़ी पौराणिक कथाएं

महाशिवरात्रि से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। जब देवताओं और असुरों ने समुद्र मंथन किया, तब हलाहल विष निकला, जिससे संपूर्ण सृष्टि के विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया। तब भगवान शिव ने इस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया और स्वयं को नीलकंठ कहा जाने लगा। इस घटना की स्मृति में महाशिवरात्रि पर्व मनाया जाता है।

महाशिवरात्रि का पर्व भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। इस बार दुर्लभ संयोग बनने से इस पर्व का महत्व और अधिक बढ़ गया है। त्रिवेणी संगम में स्नान, शिवालयों में रात्रि जागरण और विशेष अनुष्ठानों से यह पर्व और भव्य होगा। जो भक्त सच्चे मन से भगवान शिव की आराधना करेंगे, उन्हें जीवन में सफलता और मोक्ष की प्राप्ति होगी।

भगवान शिव की कृपा से समस्त भक्तों की मनोकामनाएं पूरी हों, ऐसी कामना करते हुए सभी शिवभक्तों को महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं! हर-हर महादेव!

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